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Wednesday, 1 October 2014

दर्द ख़ुद ही जुबां हो गयी

दर्द ख़ुद ही जुबां हो गयी
ज़ुल्म की इंतहां हो गयी
बर्फ की इक नदी थे हम
तेरे प्यार में रवां हो गयी
ग़म हमारा सबके लिए 
मज़े की दास्तां हो गयी 
तुम हमसे मिल गए हो 
हसरतें जवां हो  गयीं
तेरी सादगी मेरा प्यार
अबतो हमनवां हो गयी

मुकेश इलाहाबादी -------

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