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Tuesday, 29 March 2016

चाँद से बतियाना चाहता हूँ

मैं चाँद से
बतियाना चाहता  हूँ
उसे  छूना चाहता हूँ
आसमान से उतार के
हथेलियों के बीच
महसूसना चाहता हूँ
उसे गोल गोल
गेंद सा घूमना चाहता हूँ
और फिर
आसमान में उछल के
हथेलियों में कैद कर लेना चाहता हूँ
यहाँ तक कि
खुशी से उसे चूम लेना चाहता हूँ
पर -
चाँद है कि आसमान से उतरता ही नहीं
रोज़
बिना नागा
सूरज ढलते ही
आ टंगता है नीले से साँवले होते
आसमान में
और मुस्कुराता है
जी ललचवाता है
जैसे ही मैं
अपनी हथेलियों में
उसे पकड़ना चाहता हूँ
मुँह चिढ़ाता हुआ
बादलों में छुप जाता है
और फिर
बहुत देर तक छुपा रहता है
और मैं यहाँ
मुँह ढांप सो जाता हूँ
फिर से
सुबह के बाद
दोपहर और फिर
सांझ के इंतज़ार में
शायद चाँद के इंतज़ार में

मुकेश इलाहाबादी --------------

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