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Friday, 1 July 2016

ख्वाहिशें इन्सान के लिये खाद पानी होती हैं

सुमी,

ख्वाहिशें इन्सान के लिये खाद पानी होती हैं। इन्सान के अंदर ख्वाहिश न हो कुछ पाने की कुछ जानने की कुछ करने की तो समझ लो वह इन्सान इन्सान नही जड है पत्थर है, एक बेजान मूरत है। यही ख्वाहिशे ही तो हैं जो इन्सान को आगे आगे और आगे बढाती है। यही ख्वाहिशे तो है जो इन्सान को तरक्की के रास्ते पे ले जाती हैं। ख्वाहिशे न होती तो इन्सान इन्सान नही जानवर होता।

एक बात जान लो ख्वाहिशों मे और अमरबेल मे कोई फर्क नही है। अमर बेल की सिफ़त होती है कि उसकी कोई जड नही होती वह किसी न किसी पेड का सहारा ले के बढती है, और वह जिस पेड का सहारा और खाद पानी लेकर बढती है उसी को सुखा देती है। बस उसी तरह इन ख्वाहिशों का समझो। ये ख्वाहिशें वो अमर बेल हैं जो हर इंसान के अंदर जन्म लेती हैं और फिर इन्सान इस बेल को पुष्पित और पल्लवित करने मे लगा रहता है, और नतीजा यह होता है कि उसकी ख्वाहिशों की अमर बेल तो फलती फूलती रहती है दिन दूनी बढती रहती है पर वह इन्सान दिन प्रतिदिन सूखता जाता है, सूखता जाता है, और एक दिन सूख कर खुद को ही खत्म कर लेता है।
और जिसने इस ख्वाहिशों रुपी जहरीली अमरबेल को शुरुआत मे ही बढने से रोक देता है वही अपने वजूद को बचा पता है। या फिर इन्हे उतना ही फैलने देता है जितनी उस इन्सान की शक्ति और सामर्थ्य है। वर्ना उस इन्सान का वजूद खत्म ही समझो।
सुमी, ऐसा नही कि मेरे अंदर कोई ख्वाहिश नही। मेरे मन मे भी कई ख्वहिशें रही कई सपने रहे जिन्हे मै बडी शिददत से पालता रहा देखता रहा। पर मैने कभी इन ख्वाहिशों को इतना पर नही फैलाने दिया कि वो मेरे ही वजूद पे हावी हो जायें। हालाकि, इस बात से कई बार मेरी चाहते फलने फूलने और पूरी होेने के पहले ही मर खप गयीं और मै काफी देर तक तरसता रहा तडपता रहा, पर यह भी है कि, बाद मे मेरा यही निर्णय सही भी साबित हुआ। आज मै बहुत खुश नही हूं तो दुखी भी नही हूं।
लिहाजा मेरी जानू मेरी सुमी, मै तुमसे भी यही कहूंगा कि सपने देखो पर सपनो में डूबो नही। ख्वाहिशें रक्खों पर ख्वाहिशों के लिये पागल मत बनो।
और जो ऐसा कर लेता है वही बुद्ध है वही ज्ञानी है वही महात्मा है वही सुखी है।

बस आज इतना ही कहूंगा। बाकी सब कुछ यथावत जानो।

मुकेश इलाहाबादी ----

सुनो ,
तुम सुन रहे हो ना ?
तुम ठीक ही कह रहे हो ,ये ख्वाब ही सच है ?
हाँ......ये ख्वाब ही सच है ! जो जीने के लिये ज़रूरी है, जिंदगी को जीने के लायक........यही ख्वाब तो बनाते है ,वरना कितना कठोर है यथार्थ का धरातल...............मगर क्या ये आँखे ख्वाब देखती है ? तुमने देखा है कभी किसी आँख में ख्वाब तैरता.........मैने देखा है !
सच मैने देखा है तुम्हारी आँखो में...एक ख्वाब तैरता.....मेरी सूरत की सूरत में..........मैने देखा है खुद को तुम्हारी आँखो में, तो क्या मै ही तुम्हारा ख्वाब हूँ..........शायद........!!
मगर ख्वाब ये आँखे नहीँ रचती...वो तो सिर्फ़ देखती है, फ़िर कौन रचाता है ये ख्वाब......मै बताऊँ......ये मन.......हाँ ये मन ही कुँचि पकड़ता है, दिल के लहू में डूबा कर रच देता है ख्वाब, आँखो में तो मात्र परछाई है उस ख्वाब की....जो दिल ने रचा.......तभी तो होता है ये........जब कोई ख्वाब टूटता है.....दिल खून के आँसू रोता है, इनकी तो रचना ही लहू से हुई, टूटने पर बहना ही था, एक दर्द का झरना....मगर मै तुम्हारे ख्वाब नहीँ टूटने दूँगी....रच दूँगी एक और.....अगर इक टूटा.....दूसरा....धीरे - धीरे मेरे ख्वाब तुम्हारे हो जायेंगे ! बस अब और नहीँ.....टूटने दूँगी तुम्हे कतरा कतरा....मेरे ख्वाब सजा कर..........मगर कैसे तुम्हारी आँखो से दिल में उतर जाऊँ ,थाम लूँ वो कुँचि और रच दूँ वो हर ख्वाब जो तुमने देखे मेरे लिये..........हर ख्वाब....हाँ हर ख्वाब......मगर फ़िर भी तुम भी जानते हो मै नहीँ हूँ.........
मै नहीँ हूँ.............
तुम्हारी सुमि
अलविदा "

(नाम न छापने की शर्त पे एक पाठिका ने खत का जवाब भेजा