होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Wednesday, 1 February 2017

अँधेरा तो तैयार बैठा है, मिटने को

अँधेरा तो तैयार बैठा है, मिटने को
कोई तैयार ही नहीं सूरज बनने को

तमाम दरिया बह उठेंगे सहारा में
इक हिमालय तो हो पिघलने को

ग़र चाहते हो तिशनगी मिट जाए
राज़ी तो हो, बादल बन, बरसने को

कबीर यूँ  ही नहीं बन जाता कोई ?
पहले हिम्मत तो हो घर फूंकने को

ज़माना इक दिन में बदल जायेगा
मुकेश लोग तो राज़ी हों बदलने को

मुकेश इलाहाबादी ------------------

No comments:

Post a Comment