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Friday, 12 May 2017

तुम, ही छन्द हो

तुम,
ही छन्द हो
तुम ही बंद हो
तुम ही लय हो
तुम ही अर्ध विराम
तुम ही पूर्ण विराम हो
तुम ही आरम्भ
तुम अंत हो
मेरी कविता का
ओ ! मेरी कविता
ओ ! मेरी सुमी
सुन रही हो न ?
पढ़ रही हो न मेरी कवितायेँ ?

मुकेश इलाहाबादी ---------