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Wednesday, 14 June 2017

पुल हूँ मै

टूटा
ज़र्ज़र पुराना
पुल हूँ मै

जिसके
नीचे कोई नदी
नहीं बहती

हाँ ! सूखी हुई नदी
के निशाँ ज़रूर हैं
दूर तक

आब की नदी तो नहीं
हाँ ! पत्थरों की नदी ज़रूर बहती है
दूर - दूर तक
जिससे
तुम्हारी प्यास न बुझेगी
कतई

मेरे
सीने पे
फ़क़त
तन्हाईयाँ डोलती हैं
इस छोर से उस छोर तक

इस टूटे ज़र्ज़र पुल से
तुम पार भी नहीं उतर सकते

तुम !  लौट जाओ पथिक

मुकेश इलाहाबादी --------