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Saturday, 17 June 2017

सुमी,
 तुम्हारी बातों में वो गर्मी नहीं दिखाई देती, वो नरमी नहीं दिखाई देती , वक़्त की सर्द रातों ने सारी की सारी आग राख में तब्दील कर दी?
 चलो कोइ बात नहीं। गिर फिर कभी तुम्हे दोस्ती की आँच की ज़रा भी दरकार होगी, तो बस इस भूले हुए रिश्ते को थोड़ा कुरेद भर देना, मै
 तुम्हे मौजूद मिलूँगा राख में क़ैद चिंगारी का, तुम्हारे आँचल की हवा से फिर सुलगने को बेताब मिलेंगे।
 देखो तो ! या हवा भी कितनी पागल है -  कभी चलती है तो इतनी तेज़ इतनी तेज़ की सब कुछ उड़ा ले जाने को बेताब रहती है - चाहे वो
घर हो झोपड़ा हो महल हो किसी की यादें हो असबाब हों , और कभी तो इतनी मद्धम मद्धम चलती हैं जसकी खुशबू से इंसान मदहोश हो जाता है
किसी की बाँहों में खो जाने को जी चाहता है - यही हवा जब बरसात की बूंदो के साथ घुल मिल के जिस्म से टकराती है तो अजब से रूहानी
ठंडक से जी महक महक जाता है - मगर आज गर्मी के इस मैसम में हवा जाने कहाँ गायब हो गयी है ? शायद अपने माशूक  तूफ़ान से मिलने
गयी हो - या हो सकता है अपने पीहर गयी हो - या हो सकता है कंही तफरीह में निकली हो - कुछ देर बाद आये।  हूँ अच्छा याद आया तुम कब
आओगे दोस्त ??


मुकेश इलाहाबादी -----------------

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