गाँठे

 एक

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कुछ
गाँठे किसी भी
जतन से न तो खुलती हैं
न ही गलती हैं
बस टीसती रहती हैं
उम्र भर

दो
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आज फिर खोली
स्मृतियों की पोटली में लगी
तुम्हारे नाम की गाँठ
और बिखर गए
तुम्हारी यादों के हीरे मोती

उन्हें ही दिन भर सहेजता रहा
समेटता रहा

मुकेश इलाहाबादी ----

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