“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
जैसे तितली पँख सिकोड़ के बैठी है
तेरे होंठो पे हँसी ऐसे छुप के बैठी है
मेरे काँधे पे जब तो ठुड्डी रखती हैजैसे चिड़िया उड़ के मुंडेर पे बैठी है
तू धानी चुनर ओढ़ जब गले मिलेज्यूँ ज़मी फलक की गोद में बैठी है
मुकेश इलाहाबादी -----------------
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