अल्फ़ाज़ों के उस पार
अल्फ़ाज़ों के उस पार
एक ऐसी जगह है,
जहाँ शब्द पहुँचते-पहुँचते
थक जाते हैं—
और ख़ामोशी
अपनी असली आवाज़ में बोलने लगती है।
वहाँ कोई वाक्य नहीं होता,
न कोई विराम—
बस एहसास अपनी
बेआवाज़ धड़कनों में
अर्थ रचते रहते हैं।
अल्फ़ाज़ों के उस पार
एक ऐसी रोशनी है
जो आँखों से नहीं,
आत्मा से दिखती है।
वह रोशनी
कभी किसी याद का चेहरा बन जाती है,
कभी किसी दर्द की तपस्विनी।
कभी लगता है
उस पार कोई इंतज़ार करता है—
बिना कुछ कहे,
बिना कोई सवाल किए।
बस उपस्थिति में ही
सारे उत्तर छुपाए हुए।
अल्फ़ाज़ों के उस पार
प्रेम अपने सबसे सच्चे रूप में रहता है
बिना वादों के,
बिना डर के,
बस एक नर्म सी उपस्थिति की तरह,
जो छूए बिना भी
छू जाती है।
और मैं…
अक्सर शब्द लिखते-लिखते
खुद उसी पार पहुँच जाता हूँ—
जहाँ तुम हो,
और मेरी हर अधूरी पंक्ति
पूरा अर्थ पा लेती है।
मुकेश इलाहाबादी
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