सिगरेट, धुआँ, रात और तुम
सिगरेट की लौ
धीमे-धीमे
रात की सिलवटों को पढ़ रही थी
और धुआँ
तुम्हारे नाम का
एक धुँधला-सा रूप गढ़ रहा था।
कमरे की ख़ामोशी में
बस तीन चीज़ें थीं—
जलती हुई सांसें,
रात की थकी हुई नब्ज़,
और तुम्हारी याद…
जिसे बुझाने की हिम्मत
कभी मुझमें थी ही नहीं।
हर कश के साथ
एक लम्हा टूटता,
और हर टूटे लम्हे के पीछे
तुम्हारी आवाज़
किसी पुरानी ज़ंजीर की तरह
खनक उठती।
धुआँ ऊपर उठता रहा
जैसे कोई दुआ
जिसे आसमान तक पहुँचने की
जल्दी न हो…
बस तुम्हारी ओर
धीमे-धीमे बहना चाहता हो।
रात भी अजीब होती है
सबको सुला देती है,
पर एक मुसाफ़िर के दिल में
तुम्हारे होने की जलन
और मेरी बेचैन आदतें
जगा कर छोड़ देती है।
सिगरेट खत्म हुई,
रात नहीं।
धुआँ छँट गया,
तुम नहीं।
और मैं
उसी कुर्सी पर
उसी ठहराव में
बस इतना समझ पाया कि
कुछ रिश्ते
बुझकर भी
जलते रहते हैं।
— मुकेश इलाहाबादी
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