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Friday, 20 February 2026

जो मिलकर भी नहीं मिला

 जो मिलकर भी नहीं मिला

हम मिले

जैसे दो थके हुए सवाल

एक ही मौन में बैठ गए हों।


न कोई वादा,

न कोई हक़,

बस एक अजीब-सी पहचान

जो नाम माँगती ही नहीं थी।


तुम्हारे पास बैठकर

मैंने सीखा

किसी का होना

ज़रूरी नहीं कि

किसी का हो जाना हो।


हमने प्रेम को

कभी माँग की तरह नहीं रखा,

वह तो

हथेली पर रखा

दीया था

जो जलता रहा,

पर घर नहीं माँगा।


तुमने मेरी तरफ़

देखा नहीं,

महसूस किया।

और मैंने तुम्हें

पाने की ज़िद नहीं की,

बस समझ लिया।


हमारे बीच

जो नहीं हुआ,

वही सबसे ज़्यादा हुआ।


न कोई रात

जिसे याद कर

दिल धड़क जाए,

न कोई सुबह

जिससे उम्मीद बंधे

फिर भी

सब कुछ था।


कभी-कभी

मौन ने कहा

“यह प्रेम है।”

और बुद्धि ने

धीरे से जवाब दिया

“नहीं, यह स्मृति है।”


हम दोनों सही थे।


अब जब

सब कुछ शांत है,

तो समझ आता है—

कुछ संबंध

मिलने के लिए नहीं,

मुक्त होने के लिए आते हैं।


तुम मेरी कहानी नहीं बने,

और मैं तुम्हारी आदत नहीं।

हम

एक-दूसरे की

याद में भी

हल्के ही रहे।


जैसे

राख पर लिखी

कोई दुआ

जो पढ़ी नहीं जाती,

बस बुझ जाती है।


मुकेश ,,,,,,,,,,

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