बेनाम मोड़ पर ठहरी रूह,
जैसे सदियों से किसी आहट की मुंतज़िर हो—
न आगे बढ़ने की जल्दी,
न पीछे लौटने की हिम्मत।
रास्ता यहाँ आकर
अचानक ख़ामोश हो जाता है,
मानो मिट्टी ने अपने होंठ सी लिए हों
और हवाओं ने पाँव समेट लिए हों।
मैं उसी मोड़ पर खड़ा हूँ
जहाँ न कोई पत्थर पर लिखा नाम,
न किसी दरख़्त की छाँव में
आराम की इजाज़त।
सिर्फ़ एक ठहराव है
गहरा, धुँधला,
रगों में उतरता हुआ।
दिन यहाँ बिना आवाज़ के ढलता है,
सूरज अपनी आख़िरी किरण
मेरे कंधे पर रखकर
चुपचाप चला जाता है।
रात आती है तो
सितारे दूर से देखते हैं
जैसे मेरी तन्हाई का
हिसाब लगा रहे हों।
इस मोड़ पर
वक़्त भी रुक-रुक कर साँस लेता है,
घड़ी की सुइयाँ थक जाती हैं
मगर दिल की धड़कन
अपने ही साए से बातें करती रहती है।
कभी लगता है
यही वो जगह है
जहाँ ख़्वाबों ने
मुझसे विदा ली थी।
कभी यूँ भी लगता है
यहीं किसी ने
मेरे हाथ में अपनी उँगलियाँ रखकर
कहा था, “चलो…”
और मैं आज तक
उस अधूरे “चलो” की गूंज में
ठहरा हुआ हूँ।
बेनाम मोड़
जहाँ यादें पत्थरों पर बैठी रहती हैं,
और रूह
अपने ही सवालों का
जवाब टटोलती है।
यहाँ कोई मंज़िल नहीं,
सिर्फ़ एहसास है
कि सफ़र बाहर नहीं,
अंदर चलता है।
मेरी रूह ने
यहीं कहीं अपना आईना रख दिया था,
और जब भी मैं झुककर देखता हूँ,
चेहरा धुँधला पड़ जाता है
जैसे मैं ख़ुद को
पूरी तरह पहचान नहीं पाया।
कभी कोई हवा
तुम्हारी खुशबू लेकर गुज़रती है,
तो लगता है—
यह मोड़ बेनाम नहीं,
तुम्हारे नाम का इंतज़ार है।
कभी कोई परिंदा
आकर पास बैठता है,
और फिर उड़ जाता है
जैसे मेरी ठहरी हुई रूह को
उड़ान का सबक़ दे गया हो।
मैं सोचता हूँ
क्या हर मुसाफ़िर को
एक ऐसा मोड़ मिलता है
जहाँ उसे रुककर
अपने भीतर उतरना पड़ता है?
शायद यह सज़ा नहीं,
रहमत है
कि रूह को भी
कभी-कभी ठहरकर
अपनी थकान उतारनी चाहिए।
बेनाम मोड़ पर ठहरी रूह—
अब समझने लगी है
कि नामों से परे भी
एक पहचान होती है।
और शायद
जब अगली बार क़दम उठेगा,
तो रास्ता खुद जन्म लेगा
मेरे यक़ीन की मिट्टी से।
तब यह मोड़
बेनाम नहीं रहेगा—
यह मेरी रूह का
पहला सच होगा।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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