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Saturday, 21 February 2026

मुद्दत हुई — कारवाँ-ए-ख़ामोशी

 मुद्दत हुई — कारवाँ-ए-ख़ामोशी


मुद्दत हुई

इक सूनी राह के कारवाँ में हूँ,

जहाँ धूल भी तन्हा चलती है

और हवाएँ अपने ही क़दमों की आहट से डर जाती हैं।


न मंज़िल का पता,

न नक़्शे का पता कि किस राह जाना है

हर सिम्त धुंध की तहें हैं,

जैसे किसी बूढ़े फ़क़ीर की आँखों में

बीते जनमों की परछाइयाँ उतर आई हों।


दिन आता है तो

सूरज मेरे कंधे पर हाथ रखकर पूछता है—

“कहाँ तक जाओगे यूँ ही?”

और मैं मुस्कुरा देता हूँ,

जैसे सवालों का भी कोई जवाब नहीं होता।


रात उतरती है तो

चाँद मेरी वीरानी का

सफ़ेद गवाह बन जाता है,

सितारे तसब्बुर की तरह

दूर-दूर टिमटिमाते रहते हैं

मगर नींद की देहरी पर

कोई ख़्वाब दस्तक नहीं देता।


न पैरों में जूते,

न बदन पे मौसम के कपड़े—

सर्दियाँ मेरी हड्डियों में उतरती हैं,

गरमियाँ रगों में अंगारे भर देती हैं,

बरसातें मेरी पलकों पर

अधूरी दुआओं-सी टपकती रहती हैं।


न असबाब ही ज़रूरतों के,

न सर पर कोई साया—

बस एक लंबा रास्ता है

जो मेरे अंदर से गुज़रता हुआ

आसमान तक चला गया है।


हाँ, साथ है

अपने किसी की यादें।


वो यादें,

जो कभी गुलाब की पंखुड़ियों-सी

मेरे सीने में खुल जाती हैं,

और कभी ख़ार बनकर

रूह की तहों में चुभती रहती हैं।


उसकी आवाज़

जैसे दूर किसी मस्जिद से आती अज़ान,

जो हर गुमशुदा को

अपने रब की तरफ़ बुलाती है।


उसकी हँसी—

जैसे बारिश के बाद

भीगे पेड़ों से झरती धूप,

जिसमें कुछ पल को

मेरी थकी हुई रूह

सुकून की चादर ओढ़ लेती है।


कभी लगता है

ये कारवाँ सूना नहीं

उसकी आहटें मेरे साथ चलती हैं,

मेरे साए में उसका साया

धीमे-धीमे सांस लेता है।


मैं जब भी गिरता हूँ

रास्ते की ठोकरों से,

उसकी यादें मुझे थाम लेती हैं

जैसे माँ की दुआ

बच्चे के माथे पर ठहर जाए।


ये सफ़र शायद

किसी और ही मंज़िल का इशारा है

जहाँ नक़्शे नहीं होते,

जहाँ राहें खुद बनती हैं

रूह के इरादों से।


मुद्दत हुई

इक सूनी राह के कारवाँ में हूँ—

मगर अब समझ आया है,

तन्हाई भी एक नेमत है,

अगर उसमें किसी की मोहब्बत

चराग़ बनकर जलती रहे।


मैं चलता रहूँगा

नंगे पाँव,

बिना असबाब,

बिना मंज़िल की ख़बर के


क्योंकि मेरे पास

उसकी यादों का उजाला है,

और वही उजाला

मेरी रूह का काफ़िला है।


शायद किसी मोड़ पर

वो खुद सामने आ जाए

या फिर

मैं उसी की याद में

एक मुकम्मल दुआ बन जाऊँ।


मुद्दत हुई

मगर सफ़र अब भी जारी है…

और इस सूनी राह में भी

मोहब्बत की रौशनी

मेरे साथ चल रही है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,

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