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Saturday, 21 February 2026

आत्मा और जीवात्मा का वेदान्तीय स्वरूप

 आत्मा और जीवात्मा का वेदान्तीय स्वरूप

उपनिषदों की रहस्यमयी वाणी बार–बार स्मरण कराती है –

“आत्मा नित्य है, शुद्ध है, बुद्ध है, मुक्त है।” (छान्दोग्य उपनिषद् 6.8.7)

यह आत्मा न जन्म लेती है, न मरती; यह अकेली सत्यता है—सभी अनुभवों की निरपेक्ष साक्षी।

किन्तु जब यही आत्मा, माया के बंधनों में पड़कर, देह और मन से स्वयं को जोड़ लेती है, तब वह जीवात्मा कहलाती है।

वेदान्त इसे एक दर्पण की तरह चित्रित करता है—आत्मा सूर्य है, निर्मल और अपराजेय; लेकिन जब उसका प्रतिबिंब जल की लहरों में पड़ता है, तो वह छाया कंपकंपाने लगती है। वही जीवात्मा की स्थिति है, अनुभव के सागर में डोलती छाया।

उपनिषद और आत्म–शुद्धि

उपनिषद बार–बार कहते हैं—जीवात्मा की मलिनता उसकी स्वाभाविक पहचान नहीं।

“श्रवणं, मननं, निदिध्यासनम्” (बृहदारण्यक उपनिषद् 1.4.1)—इन तीन साधनों के द्वारा मन के आवरण हटते हैं और आत्मा की शुद्धता प्रकट होती है।

छान्दोग्य उपनिषद का महावाक्य है—

“तत्त्वमसि श्वेतकेतु”—“तू वही ब्रह्म है।”

यह वाणी जीवात्मा और परमात्मा के भेद को समाप्त कर देती है।

शंकराचार्य का प्रसिद्ध वचन है—

“ब्रह्म सत्य है, जगत् मिथ्या है, और जीवात्मा सदा ब्रह्म के समान है।”

ज्योतिष: आत्मा का दर्पण

जन्मकुंडली केवल ग्रहों का गणित नहीं, आत्मा की यात्रा का अदृश्य मानचित्र है।

आत्मरूप के तीन विशेष संकेतक जन्मपत्रिका में झलकते हैं

लग्न: आत्मा का प्रकट रूप; बलवान लग्न जीव को आत्मबोध के निकट लाता है।

चन्द्रमा: मन का प्रतिनिधि—आत्मा का मनुष्य में प्रतिबिंब; शांत चन्द्र आत्मा के ज्योत्स्नामय प्रकाश को प्रकट करता है।

आत्मकारक (जैमिनी पद्धति): जो ग्रह आत्मा के कर्मबंधन को दर्शाता है—यदि त्रिकोण या केन्द्र में है तो मोक्ष–पथ प्रशस्त करता है।

जैमिनी कहते हैं—

“आत्मा केवल साक्षी है, कर्म का फल देनेवाली; ग्रहों की स्थिति जीवन–मार्ग की दिशा बताती है।”

कुंडली में आत्मा के स्तर को जानने का मार्ग

यदि लग्नेश व आत्मकारक शुभ होते हैं—आत्म–यात्रा सरल व निर्मल।

चन्द्रमा पापग्रही या अमावस्या में—जीवात्मा अशांत।

आत्मकारक उच्च या त्रिकोण–केन्द्र में—मोक्ष की ओर गमन।

दार्शनिक निष्कर्ष

इस प्रकार, वेदान्त और ज्योतिष मिलकर यह उद्घाटित करते हैं कि आत्मा की वास्तविकता सदा निष्कलंक और मुक्त है।

आत्मा सूर्य है, जीवात्मा उसकी छाया—जन्मपत्रिका उस छाया की रूप–रेखा।

अन्ततः साधना, शास्त्र और अनुभव—इन तीनों के संगम से ही आत्मा अपनी शाश्वत ज्योति पहचान पाती है


मुकेश ,,,,,,,,,,,


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