नख-शिख वर्णन
रेत-सा निखरा रूप!
मणि-मुक्ता-सी स्निग्ध कांती,
पाद-पद्म मिश्रित गगन-गामिनी, रेखाएँ मृदु कमल सी शांत।
घुटनों की अंगुलियों में चपलता माधवी की,
नाभि में क्षितिज की गहराई,
तनु कटि में कालिंदिनी लहर,
मृणाल-सी प्रशस्त भुजायें,
कहर करतीं कंचन-सी नरम बाँहें।
वक्षस्थल में बसा अनंग का मंदिर,
गुलाबी गंध बिखेरता धड़कन की वीणा,
ग्रीवा में स्फटिक-धारा झर रही,
मुख में कोमलता चंद्रिका की।
कान्ति अधरों पर रक्तज आभा,
दंतावली में से निकला स्फटिक-मणि,
वाणी में गिरा का मदिर नाद,
मधु-छाया नयनों में मानस का चौपाय।
भाल में वेदों की स्मृति-रेखा,
श्याम चुलबुली अलकें घुँघराली
नयनों की गहराइयों में छलकती प्रेम-झील।
श्रवण कर्ण के छोर पर अभिनव संगीत,
मुखड़ा हिमगिरि-सी उजली आभा में भीगा,
दृग-बिंदु बरसाते वितान,
प्रिय के चित्त में तरंगे उठाते प्रबल त्रास।
ऐसी अनुपमा रूप-राशि,
शब्दों से नित नवीन गढ़ी गई,
कवियों के कल्पित श्रेष्ठतम स्वप्नों से भी अप्रतिम
हे अनिर्वचनीय, अनुपम!
तेरे नख-शिख अभियान में छुपा है सौंदर्य का चिरंतन वेदांत।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,
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