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Saturday, 21 February 2026

नख-शिख वर्णन

 नख-शिख वर्णन

रेत-सा निखरा रूप!

मणि-मुक्ता-सी स्निग्ध कांती,

पाद-पद्म मिश्रित गगन-गामिनी, रेखाएँ मृदु कमल सी शांत।

घुटनों की अंगुलियों में चपलता माधवी की,

नाभि में क्षितिज की गहराई,

तनु कटि में कालिंदिनी लहर,

मृणाल-सी प्रशस्त भुजायें,

कहर करतीं कंचन-सी नरम बाँहें।


वक्षस्थल में बसा अनंग का मंदिर,

गुलाबी गंध बिखेरता धड़कन की वीणा,

ग्रीवा में स्फटिक-धारा झर रही,

मुख में कोमलता चंद्रिका की।


कान्ति अधरों पर रक्तज आभा,

दंतावली में से निकला स्फटिक-मणि,

वाणी में गिरा का मदिर नाद,

मधु-छाया नयनों में मानस का चौपाय।

भाल में वेदों की स्मृति-रेखा,

श्याम चुलबुली अलकें घुँघराली

नयनों की गहराइयों में छलकती प्रेम-झील।


श्रवण कर्ण के छोर पर अभिनव संगीत,

मुखड़ा हिमगिरि-सी उजली आभा में भीगा,

दृग-बिंदु बरसाते वितान,

प्रिय के चित्त में तरंगे उठाते प्रबल त्रास।


ऐसी अनुपमा रूप-राशि,

शब्दों से नित नवीन गढ़ी गई,

कवियों के कल्पित श्रेष्ठतम स्वप्नों से भी अप्रतिम

हे अनिर्वचनीय, अनुपम!

तेरे नख-शिख अभियान में छुपा है सौंदर्य का चिरंतन वेदांत।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,

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