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Saturday, 21 February 2026

चाँदनी की धीमी लहरों में,

 चाँदनी की धीमी लहरों में,

तेरी साँसों का ताप

मेरे कानों के पास ठहरता है,

जैसे कोई अनकहा वादा।


तेरी गर्दन की मोड़ पर,

रात ने अपनी उँगलियाँ रख दी हैं,

और मैं उन उँगलियों के निशान

अपनी होंठों से पढ़ता हूँ।


हवा में नमक घुला है,

पसीने की हल्की खुशबू

जिसे मैं हर बार पीना चाहता हूँ,

जैसे कोई गुप्त मदिरा।


तेरी उंगलियों का भरपूर चक्कर

मेरी रीढ़ पर घूमता है,

हर नस में कोई अज्ञात गीत

धड़कता है, नया सा।


कपड़ों के किनारे

चुप्पी का डर महसूस करते हैं,

वे गिरना चाहते हैं

जैसे छुटकारा पा रहे हों।


मेरे होंठों से निकलती आह

तेरे कान में घुल जाती है,

हमारे बीच अब कोई शब्द बचा नहीं,

बस मिलन की भाषा।


तेरे बालों में उलझती साँसें

हर बार और गहरी होती जाती हैं,

मैं फँस जाता हूँ

तेरी मायाओं में।


हमारे शरीरों का नक्शा

अब किसी किताब का नहीं,

बिस्तर ही असल धरती है,

हम उसकी मुक्ति के पंछी।


तेरी कमर का वह वक्र

मेरे हाथों की बंदिश तोड़ता है,

हम दोनों खुलते हैं

दुनिया की हर सीमाओं से।


बाहर कोई सुबह इंतजार करती होगी,

मगर इस रात में

आँखें बंद नहीं,

बस सपनों के रास्ते खुले हुए।


तेरी मुस्कान की छाया में

मेरी हँसी के रंग घुल जाते हैं,

शब्दों की जरूरत नहीं रहती

जब संवेदना मुखर हो।


एक पल की स्वतंत्रता

हजार बंद किवाड़ खोल देती है,

हम अपने अस्तित्व के गीत

दो जिस्मों की जुगलबंदी में गाते हैं।


तेरी पलकों के नीचे

मेरा नाम लिखा है,

मैं पढ़ता हूँ हर बार

नये अर्थ में।


तेरी छाती पर टिककर

धड़कन की भाषा समझता हूँ,

रात की हर धड़क

मुक्ति की घोषणा है।


हम न तो अपने बीते हुए कल

न ही आने वाले कल में हैं,

बस इस क्षण

हम पूरे हैं, पूरे से भी ज्यादा।


यह स्पर्श, यह प्रेम

न कोई बंधन, न कोई सीमा,

हमारी आज़ादी

इसी बिस्तर, और इस मिलन में छुपी है।


सुबह की आहट कभी आयेगी,

मगर रात की खुली मुक्ति

आज हमारे साथ जुड़ी है।


मुकेश ,,,,,,,

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