तुम गए तो,
क़लम के सिरे पर ठहर गई खामोशी।
स्याही सूखती नहीं थी
बस दिल के भीतर रिसती रही,
हर लफ़्ज़ की जगह एक आह उतरती रही।
कभी जो शेर बनते थे,
अब साँस बनकर अटकते हैं गले में।
हर मिसरा,
एक पुरानी याद का टुकड़ा है
जिसे जोड़ने की कोशिश में
ज़िंदगी काग़ज़ के समान फटती चली जाती है।
कभी तुम कहती थीं,
“शब्द मेरा आईना हैं…”
अब वही आईना टूटा पड़ा है,
उसमें तुम्हारा चेहरा नहीं
बस मेरी परछाईं है,
जो तुम्हारी तलाश में धुँधली होती जाती है।
अधूरी ग़ज़ल
सिर्फ़ एक अधूरा इश्क़ नहीं,
वह एक अधूरी प्रार्थना है,
जो लफ़्ज़ों में नहीं,
सन्नाटों में गूँजती है।
हर बार जब मैं लिखने बैठता हूँ,
स्याही तुम्हारा नाम बनने लगती है।
क़लम काँप जाती है
शायद उसे भी पता है,
कि हर अक्षर तुम्हारी रूह से टकराएगा।
मेरी मेज़ पर अब भी वही पुरानी डायरी रखी है,
जिसके पन्नों में कुछ शब्द अब भी साँस लेते हैं।
तुम्हारे जाने के बाद,
हर अधूरी पंक्ति ने खुद को सवाल बना लिया
“क्या प्रेम सिर्फ़ लिखा जा सकता है,
या जिया भी जा सकता है?”
रात के अँधेरे में,
जब कोई शेर मुकम्मल नहीं होता,
तो लगता है
तुम्हारी याद ही उस क़ाफ़िये की कमी हो।
और मैं सोचता हूँ —
कहीं तुम वो आख़िरी मिसरा तो नहीं,
जो इस ग़ज़ल को मुकम्मल कर दे?
पर फिर खामोशी उतर आती है
जैसे कोई पर्दा,
जो हक़ीक़त और ख्व़ाब के बीच झूलता रहे।
और मैं समझ जाता हूँ
हर इश्क़ की तरह,
हर ग़ज़ल को भी अधूरा रहना होता है।
क्योंकि पूर्णता में जो कहा जाता है,
वह मिट जाता है
और अधूरापन ही वो जगह है,
जहाँ आत्मा अब भी बोलती है,
तेरे नाम की प्रतिध्वनि में।
कवि टिप्पणी:
“यह नज़्म उन सभी अधूरी ग़ज़लों की आत्मा है —
जो प्रेम में पूरी नहीं हो पाईं,
क्योंकि प्रेम का सत्य हमेशा अधूरापन ही होता है।
जो रह गया — वही सबसे सच्चा है।”
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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