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Saturday, 21 February 2026

मौन का डिजिटल रूप

 मौन का डिजिटल रूप


पृष्ठ 1 — डिजिटल मौन का आरंभ

कभी प्रेम पत्र काग़ज़ पर लिखे जाते थे 

स्याही में भावनाएँ होती थीं, और विराम में प्रतीक्षा।

अब वही प्रेम “टाइपिंग…” में बदल गया है —

जहाँ शब्द आने से पहले ही

दिल किसी अधूरे संदेश की प्रतीक्षा में धड़कता है।


यह युग डिजिटल मौन का है।

यहाँ लास्ट सीन, ब्लू टिक, और ऑनलाइन स्टेटस

नए युग के मौन संकेत बन चुके हैं।

कोई जवाब नहीं देता 

मगर उस “seen” शब्द के पीछे भी

एक पूरा अधूरा संवाद छिपा होता है।


डिजिटल युग ने संवाद को गति दी,

पर संवेदना से उसकी गहराई छीन ली।

अब प्रेम का इज़हार शब्दों से नहीं,

बल्कि रीड रिसीट्स से मापा जाता है।


पृष्ठ 2 — प्रेम और आत्मा के बीच का नेटवर्क

प्रेम अब नेटवर्क पर चलता है,

पर आत्मा अब भी वही पुराना रेडियो है —

जो तरंगों पर “भावना” पकड़ती है,

डेटा पर नहीं।


कभी आत्मा मिलन चाहती थी,

अब कनेक्शन ढूँढती है।

पर जब सिग्नल गिरता है,

तब भीतर का मौन जागता है।


इस मौन में कुछ टूटता नहीं,

बल्कि कुछ जन्म लेता है 

एक गहरा आत्म–संवाद,

जहाँ प्रेम अब प्रतिक्रिया नहीं, अनुभूति बन जाता है।


पृष्ठ 3 — लास्ट सीन : आत्मा की प्रतीक्षा का प्रतीक

“लास्ट सीन 10:45 PM” —

बस इतना लिखा होता है,

और आत्मा समझ जाती है कि अब प्रतीक्षा करनी है।


कभी ये लास्ट सीन

किसी की लास्ट मीटिंग जैसा लगता है।

वो मौन जो वहाँ जन्म लेता है,

वो डिजिटल नहीं — आध्यात्मिक होता है।


यह वही मौन है जो

कबीर के “सुनता” शब्द में,

मीरा के “राधे” पुकार में,

और बुद्ध के “मौन उपदेश” में गूंजता था।


मौन का यह डिजिटल रूप

अब शब्दों में नहीं,

बल्कि स्क्रीन की चमक में बसता है 

जहाँ हर “seen” एक प्रश्न है :

क्या आत्मा अभी भी जुड़ी हुई है?


पृष्ठ 4 — डिजिटल आत्मा और ध्यान की पुनर्खोज

डिजिटल युग ने आत्मा को भी एक नोटिफिकेशन बना दिया है।

वो भीतर से पुकारती है 

“थोड़ा रुक जा, ऑनलाइन नहीं, अंतर्मन में जा।”


जब हम चैट की भीड़ में खो जाते हैं,

तब वही मौन हमें पुकारता है 

कि अब ध्यान की ज़रूरत है,

क्योंकि “डिजिटल कनेक्शन”

तब तक अधूरा है,

जब तक “आत्मिक कनेक्शन” न हो।


मौन का यह नया रूप

सिखाता है कि संवाद सिर्फ़ शब्दों का नहीं,

बल्कि ऊर्जा का लेन–देन है।

और शायद यही प्रेम का सबसे गहरा अर्थ है —

जब दो आत्माएँ बिना बोले

एक ही आवृत्ति पर कंपन करने लगें।


समापन :

मौन अब सिर्फ़ चुप्पी नहीं,

एक नई भाषा है —

जहाँ “लास्ट सीन” भी ध्यान का निमंत्रण है,

और “टाइपिंग…” किसी अधूरे प्रेम का मंत्र।


— मुकेश इलाहाबादी


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