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Saturday, 21 February 2026

काला और सुनहरा

 काला और सुनहरा


 ख़ामोश लफ़्ज़ों का सफ़र,,,,,

कभी शब्द चुप रहते हैं 

मगर उनकी गूंज दिल के भीतर बहुत गहरी उतरती है।

यह वही गूंज है जो अंधकार के बीच

प्रकाश की तरह चमक उठती है।


यह संग्रह उसी “काला–सुनहरे” सफ़र की यात्रा है 

जहाँ दुःख भी रचना बन जाता है,

और प्रेम भी तप बन जाता है।


1. ख़ामोश लफ़्ज़ों का सफ़र

कहना था बहुत कुछ,

मगर जुबाँ ने इनकार किया।

दिल ने कहा ,

“अब ख़ामोशी बोलेगी।”

हर नज़र में एक कहानी थी,

हर पल में एक जज़्बात,

पर दोनों ने बस मुस्कुरा कर

समय को जवाब बना दिया।


2. रात के किनारे

रात के सन्नाटे में

तेरी यादें चाँद बनकर उतरती हैं।

हवा से कोई कहता है 

“वो भी शायद जाग रही होगी।”


3. अधूरी ग़ज़ल

क़लम उठी 

मगर तेरे जाने के बाद

हर शेर अधूरा रह गया।

जैसे दिल का एक हिस्सा

अब भी तेरे नाम बंधा है।


4. बारिश में ख़त

तेरे नाम लिखा ख़त भीग गया,

स्याही धुली, पर यादें नहीं।

बारिश बोली 

“इश्क़ को शब्दों में नहीं,

आँसुओं में लिखना चाहिए।”


5. राख में चिंगारी

कहते हैं, वक्त सब मिटा देता है,

पर दिल कहता है 

“कुछ चीज़ें बस सुलगती रहती हैं।”

वो तू नहीं थी,

वो इश्क़ था जो मरकर भी ज़िंदा है।


6. तेरी मुस्कान की ख़ुशबू

तेरी मुस्कान 

जैसे किसी पुराने ज़ख़्म पर मरहम,

जैसे अँधेरे कमरे में

एक दीया जल उठा हो।


7. सुबह के पहले लम्हे में

पहली किरण जब गालों को छूती है,

दिल फुसफुसाता है —

“शायद आज वो याद न आए…”

पर हवा तेरी आवाज़ ले आती है।


8. ख़ामोशी का इश्क़

अब बोलना अच्छा नहीं लगता,

क्योंकि ख़ामोशी में तेरा नाम छिपा है।

शब्द अब सिर्फ़ पर्दे हैं,

दिल की ज़ुबान तो चुप्पी ही है।


9. तुम और मैं

तुम हो उधर,

मैं इधर,

बीच में सिर्फ़ मौन का सागर।

शायद यही प्रेम है 

जहाँ दूरी ही मिलन बन जाती है।


10. मौन का अर्थ

कभी सोचा था,

ख़ामोशी खाली होती है।

आज समझ आया 

यही तो सबसे गहरा संवाद है।

जहाँ कोई बोलता नहीं,

पर सब कहा जा चुका होता है।


समापन : “काला और सुनहरा”

काला — वो जो भीतर का अंधकार है,

सुनहरा — वो जो अनुभव से निकला प्रकाश है।

इन दोनों के बीच ही कवि जीता है,

लिखता है, और अमर हो जाता है।


कवि परिचय — मुकेश इलाहाबादी

प्रेम, आत्मा, और मौन के कवि 

जिनकी रचनाएँ भावना की गहराई और शब्दों की सादगी से मन को छूती हैं।

इनका लेखन एक ध्यान है —

जहाँ कला, तप और प्रेम एक हो जाते हैं।

( मुकेश इलाहाबादी)

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