ख़ामोश लफ़्ज़ों का सफ़र
कभी–कभी लफ़्ज़ बोलते नहीं, बस महसूस होते हैं।
वे हवा में तैरते हैं, आँखों में उतरते हैं, और दिल के किसी कोने में अपनी चुप्पी बसा लेते हैं।
यह संग्रह उसी ख़ामोश सफ़र की दास्तान है — जहाँ शब्द मौन हैं, मगर अर्थ अनन्त।
1. ख़ामोश लफ़्ज़ों का सफ़र
कुछ बातें कहनी थीं,
पर जुबाँ ठहर गई,
दिल ने इशारा किया
“रुक जा, अब ख़ामोशी बोलेगी।”
हर शब्द में एक कहानी थी,
हर नज़र में एक जहान,
मगर हम दोनों बस मुस्कुराए,
जैसे वक्त ने सब कह दिया हो।
2. रात के किनारे
रात जब धीमे से उतरती है,
तो चाँद के साये में तेरी यादें झिलमिलाती हैं।
नींद आती नहीं, बस एहसास जागता है,
कि कहीं तुम भी जाग रहे हो शायद।
3. अधूरी ग़ज़ल
तुम गए तो अल्फ़ाज़ सूख गए,
क़लम ने भी लिखने से इंकार किया।
हर शेर आधा रह गया
जैसे दिल अधूरा रह गया।
4. बारिश में ख़त
तेरे नाम लिखा ख़त भीग गया,
स्याही धुली — पर दर्द और गहरा गया।
बारिश ने कहा —
“इश्क़ को काग़ज़ पे नहीं, रूह में लिखना चाहिए।”
5. राख में चिंगारी
ख़त्म तो हो गया वो रिश्ता,
पर कहीं कुछ अब भी सुलगता है।
शायद मोहब्बत की यही हकीक़त है —
मरने के बाद भी ज़िंदा रह जाती है।
6. तेरी मुस्कान की ख़ुशबू
तेरी मुस्कान किसी सुबह जैसी है,
जो हर अँधेरे को रोशन कर देती है।
तू पास हो या दूर,
तेरी ख़ुशबू हमेशा मेरे साथ रहती है।
7. सुबह के पहले लम्हे में
जब पहली किरण ज़मीन को छूती है,
दिल में एक हल्की सी सरगोशी होती है —
“आज शायद वो याद न आए…”
पर फिर हवा तेरी आवाज़ ले आती है।
8. ख़ामोशी का इश्क़
अब बोलना अच्छा नहीं लगता,
ख़ामोशी में भी तेरा नाम गूंजता है।
शब्दों की नहीं,
अब एहसासों की ज़ुबान समझ आ गई है।
9. तुम और मैं
कहीं तुम, कहीं मैं
मगर दरम्यान बस एक मौन।
शायद यही फासला “प्रेम” कहलाता है —
जहाँ मिलन भी है और विरह भी।
10. समापन — मौन का अर्थ
कभी सोचा था, ख़ामोशी खाली होती है,
पर अब समझ आया
यही तो शब्दों का असली घर है।
जहाँ लफ़्ज़ नहीं, रूह बोलती है।
— अंत —
मुकेश इलाहाबादी,,,,,,,,,,,,,
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