रात के किनारे,
जब शहर की आवाज़ें थककर सो जाती हैं,
और सिर्फ़ हवा अपने पाँवों की आहट सुनाती है,
तब आत्मा धीरे-धीरे
अपने भीतर लौटने लगती है।
रात के किनारे,
एक अजीब-सी नमी होती है
जैसे कोई अधूरी चाह,
या कोई बीता हुआ आलिंगन,
जो अब भी सांस ले रहा हो
किसी और के तकिए की गंध में।
दीवार पर टंगी घड़ी भी,
इन पलों में बोलना छोड़ देती है।
उसकी सुइयाँ मानो पूछती हैं
“क्या समय रुक सकता है,
अगर दिल चाहे तो?”
रात के किनारे,
शब्द नहीं होते
बस यादें अपने पुराने वस्त्र पहनकर आती हैं।
कभी मुस्कान ओढ़े,
कभी आँसुओं में भीगी,
कभी बस ख़ामोश…
जैसे कोई अधूरी किताब,
जिसका आख़िरी पन्ना अब भी लिखा नहीं गया।
रात के किनारे,
प्रेम और एकांत की सीमाएँ धुँधली हो जाती हैं।
यहाँ न कोई अपना है, न पराया
बस एक दीया है,
जो बुझना नहीं चाहता,
और एक परछाई है,
जो साथ छोड़ना नहीं जानती।
कभी लगता है,
यह रात भी एक जीव है
जो हमारे अनकहे शब्दों को
अपने सीने में सहेज लेती है।
जो आँसुओं को शबनम बना देती है,
और दर्द को कविता में बदल देती है।
रात के किनारे,
आसमान उतना ही पास होता है
जितनी हमारी साँसें।
हर तारा एक याद बनकर झिलमिलाता है,
हर हवा का झोंका
किसी बीते संवाद का जवाब लगता है।
और तब,
जब सब कुछ थम जाता है
तुम्हारी याद,
मेरे भीतर एक दीप बन जाती है,
जो बुझती नहीं…
बस चमकती रहती है,
रात के किनारे।
— मुकेश इलाहाबादी
No comments:
Post a Comment