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Friday, 20 February 2026

रात 11 बजे - तुम्हारे मेसेज का आना

 रात 11 बजे,

औपचारिकता में तुमने “हाल” पूछा 

और अजीब बात यह है,

कि मुझे सचमुच अच्छा लगा।


शायद इसलिए नहीं कि तुमने याद किया,

बल्कि इसलिए

कि अब भी तुम्हारे शब्दों में वही पुरानी लय थी 

थोड़ी संकोची, थोड़ी थमी हुई,

जैसे कोई अनकही माफ़ी,

या बहुत देर से आई मुलाक़ात।


रात 11 बजे,

जब शहर थक चुका था,

जब घड़ियाँ भी धीरे चलने लगी थीं,

तुम्हारा वो छोटा-सा “कैसे हो?”

मेरे भीतर एक लंबा सफ़र तय कर गया।


कितना अजीब है न 

कभी जो रिश्ते दिलों के बीच रहते थे,

अब चैटबॉक्स में पनपते हैं।

भावनाएँ अब “टाइपिंग…” के नीचे छुपती हैं,

और ख़ामोशी का अर्थ

ब्लू टिक से समझा जाता है।


रात 11 बजे,

जब तुमने पूछा,

मैंने बस इतना लिखा 

“ठीक हूँ।”

पर उस “ठीक” में कितनी टूटन थी,

तुम शायद नहीं समझ पाई।


कभी-कभी लगता है,

औपचारिकता भी कृपा बन जाती है,

जब आती है किसी अपने की उँगलियों से,

किसी पुराने चैट में,

जहाँ आख़िरी संदेश

अब भी अधूरा पड़ा है।


रात 11 बजे,

मैंने उस संदेश को पढ़ा,

फिर स्क्रीन बंद की,

और कुछ देर आसमान देखा 

जहाँ तारे भी शायद

हमारी बातचीत सुन रहे थे।


तुम्हारे “हाल पूछने” में

इतनी शांति थी,

कि लगा 

प्रेम शायद ख़त्म नहीं हुआ,

बस औपचारिक हो गया है।


— मुकेश इलाहाबादी

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