टाइपिंग…
रात का वो वक्त था,
जब ख़ामोशियाँ भी सोच में डूबी थीं।
स्क्रीन पर तुम्हारा नाम चमका —
और नीचे बस एक शब्द लिखा था —
“typing…”
बस इतना ही,
और जैसे दिल की सारी धड़कनें
रुक गईं,
उम्मीद ने सांस ली,
और पुरानी यादें कुर्सी खींचकर पास बैठ गईं।
“typing…” —
कितना छोटा, कितना अस्थायी संकेत,
पर उसमें समा जाती है
पूरी एक अधूरी कहानी।
शायद तुम कुछ लिखना चाहती थीं —
वो जो कभी कह नहीं पाईं,
वो जो दिल में रह गया,
या शायद बस एक “हाय” —
जो अब भी अजनबी-सा लगता है।
पर फिर…
वो शब्द मिट गए,
स्क्रीन शांत हो गई,
और मैं फिर से अकेला रह गया
उस नीली रोशनी के नीचे।
कभी-कभी लगता है,
“typing…” भी एक रिश्ता है —
जो शुरू होता है उम्मीद से,
और ख़त्म होता है ख़ामोशी में।
तुम्हारे न लिखे हुए वाक्य,
अब भी हवा में तैरते हैं —
जैसे अधूरे सुर,
किसी पुराने गीत के।
और मैं अब भी उस चैट को देखता हूँ,
जहाँ कुछ नहीं लिखा गया,
पर सब कहा जा चुका है।
“typing…”
अब मेरे लिए कोई संकेत नहीं,
बल्कि एक प्रतीक है —
उस प्रेम का,
जो अब शब्दों की ज़रूरत नहीं समझता।
क्योंकि जो सच में महसूस किया गया,
वह लिखा नहीं जाता।
वह बस रहता है —
सन्नाटे में,
यादों में,
और किसी बीती रात के अधूरे संदेश में।
— मुकेश इलाहाबादी
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