अक्सर कोई दिन बेहूदा होता है
अक्सर कोई दिन
बेहूदा होता है—
बिन वजह भारी,
बिन वजह फीका।
सुबह का उजाला भी
थका हुआ लगता है,
और दिल
किसी अनजानी खामोशी से भर जाता है।
पर शाम को
एक छोटी-सी रोशनी
धीरे से याद दिलाती है—
बेहूदा दिन भी
ज़िंदगी का हिस्सा हैं।
मुकेश इलाहाबादी
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