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Friday, 20 February 2026

देखना

 देखना — 

देखना सिर्फ़ आँखों का काम नहीं
यह आत्मा का दरवाज़ा है,
जो हर पल खोलता-बंद करता रहता है।

हम जो देखते हैं,
वह हमेशा वही नहीं होता
जो सामने होता है;
कभी-कभी दृश्य बाहर नहीं,
भीतर पैदा होते हैं।

कभी एक चेहरा
सिर्फ़ चेहरा नहीं रहता
उसमें किसी पुराने मौसम की
खुशबू उतर आती है।

कभी कोई रास्ता
बस रास्ता नहीं होता
वह हमारी थकान,
हमारी उम्मीद और हमारा अतीत
साथ लेकर चलता है।

देखना, एक साधना है
जहाँ आँखें बंद हों
तो भी दृश्य जागते रहते हैं,
और दिल की खिड़कियों से
सच अपनी पूरी रोशनी के साथ
उभर आता है।

मुकेश इलाहाबादी,,,,,,,,,,

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