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Tuesday, 17 February 2026

यह किसी अनाम सभ्यता की नीली सांझ है

 यह किसी अनाम सभ्यता की नीली सांझ है

यह किसी अनाम सभ्यता की
नीली पड़ती सांझ है
टूटे स्तंभों पर
धूप की अंतिम रेखाएँ कांप रही हैं।
पत्थरों की दरारों में
समय ने काई उगा दी है,
और हवा
जर्जर मेहराबों से गुजरकर
बीते हुए नामों को दोहराती है।
मैं खड़ा हूँ
पर एक ही जगह नहीं।
कई सदियों के बीच फैला हुआ,
कभी किसी समुद्री तट पर,
कभी किसी बर्फ़ीले पठार पर,
कभी किसी प्राचीन नगर के सूने चौक में।
हर जगह
एक ही आकाश झुका है
गहरा, रहस्यमय,
मानो उसमें किसी स्मृति का धुआँ घुला हो।
जिस दिशा में देखता हूँ
एक धुंधली आकृति चलती दिखती है
न रानी,
न साध्वी,
न कोई स्वप्न
बस एक स्त्री
जिसके चारों ओर
अदृश्य प्रकाश का वलय है।
तुम्हारा श्रृंगार
अब भी वैसा ही विचित्र है
न कंगन,
न बिंदी,
न चूड़ियों की खनक।
तुम्हारे माथे पर
केवल एक स्थिर आकाश है,
और आँखों में
रात की लंबी यात्राएँ।
लगता है
तुमने समय को ही ओढ़ लिया है
जैसे कोई पारदर्शी चादर,
जिसमें न रंग है,
न गंध,
पर अनगिनत जन्मों की छाप है।
मैं पुकारता नहीं—
क्योंकि जानता हूँ
यहाँ आवाज़ें पत्थर बन जाती हैं।
सिर्फ़ भीतर
एक धीमा कंपन उठता है
मानो किसी प्राचीन वीणा का
टूटा तार
अब भी गूंजना चाहता हो।
दूर
सूखी नदी की धारा में
अचानक चाँद उतर आता है,
और उसकी रोशनी में
तुम्हारा चेहरा
क्षण भर को दीप्त हो उठता है।
फिर सब शांत
केवल हवा,
केवल धूल,
केवल एक लंबा विस्तार।
क्या तुम सच में हो
या यह युगों की स्मृति है
जो मेरे भीतर
आकार लेती रहती है?
मैं जानता हूँ
यह मिलन देह का नहीं,
न समय का,
न इतिहास का।
यह उस सूक्ष्म बिंदु का मिलन है
जहाँ अस्तित्व
अपने आप को पहचानता है।
और इस पहचान में
न कोई श्रृंगार है,
न कोई वियोग
सिर्फ़ एक शाश्वत सांझ
जो कभी ढलती नहीं।
मुकेश्,,,

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