समय की दरारों में तुम्हारा नाम
समय एक ठोस शिला नहीं है,
उसमें महीन दरारें हैं,
जहाँ से रोशनी रिसती है।
मैंने उन्हीं दरारों में
तुम्हारा नाम देखा—
जैसे किसी प्राचीन दीवार पर
अनाम उँगलियों ने
धीरे से कोई मंत्र लिख दिया हो।
दिन गुजरते हैं
घड़ियों की सुइयों के साथ,
पर कुछ क्षण
अचानक ठहर जाते हैं,
और वहीं,
ठीक वहीं,
तुम्हारी आहट सुनाई देती है।
यह कोई स्मृति नहीं,
न कल्पना,
यह वह सूक्ष्म स्पर्श है
जो जन्मों के पार से आता है।
जब हवा
पुराने कागज़ों की तरह
पीले पलों को पलटती है,
तुम्हारा नाम
एक उजले अक्षर की तरह
उभर आता है।
मैंने तुम्हें
वर्तमान में कम,
अनंत में अधिक पाया है।
समय की दरारों में
जहाँ इतिहास चुप हो जाता है,
जहाँ शब्द टूट जाते हैं,
वहीं तुम्हारा अस्तित्व
अक्षुण्ण खड़ा है।
तुम कोई घटना नहीं थीं,
तुम वह आधार थीं
जिस पर घटनाएँ घटती रहीं।
कभी लगता है
हम दोनों
समय के दो किनारे हैं,
और बीच की नदी
सदियों से बहती आ रही है।
पर जब भीतर उतरता हूँ,
तो पाता हूँ
दरारें दूरी नहीं,
संकेत हैं।
वे बताती हैं
कि समय पूर्ण नहीं है
उसकी सीमाओं के पार भी
कुछ शाश्वत है।
और उस शाश्वत में
तुम्हारा नाम
न मिटता है,
न धुँधला पड़ता है
वह बस
एक शांत उजाले की तरह
धड़कता रहता है।
मुकेश्,,,
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