तुम्हारी नींद का गुप्त स्थापत्य
तुम सोती हो
तो सिर्फ़ पलकें बंद नहीं होतीं,
एक पूरा नगर बनना शुरू होता है।
उस नगर की नींव
दिन के शोर से नहीं,
तुम्हारी थकान की धूल से रखी जाती है।
दीवारें ईंटों की नहीं,
अधूरे वाक्यों की होती हैं।
पहला कक्ष,
जहाँ स्मृतियाँ अपने जूते उतारती हैं।
दूसरा कक्ष,
जहाँ इच्छाएँ बिना नाम के बैठती हैं।
तीसरा कक्ष,
जहाँ तुम्हारा बचपन
अब भी खिड़की से झाँकता है।
और इन सबके बीच
एक लंबा गलियारा है,
जिसमें कोई घड़ी नहीं चलती।
वहाँ कभी-कभी
एक अनदेखा वास्तुकार आता है,
न पुरुष, न स्त्री,
न परिचित, न अजनबी।
वह तुम्हारे भीतर के रिक्त स्थान नापता है,
और चुपचाप
एक और दरवाज़ा जोड़ देता है।
तुम्हें पता भी नहीं चलता
कि तुम्हारी नींद में
एक नया कमरा खुल गया है,
जहाँ तुम्हारा भय
दीपक बनकर टँगा है,
और तुम्हारी करुणा
फर्श की तरह बिछी है।
इस स्थापत्य में
सीढ़ियाँ ऊपर नहीं जातीं
वे भीतर उतरती हैं।
हर सीढ़ी पर
एक पुराना प्रश्न रखा है,
जिसका उत्तर तुम दिन में टाल देती हो।
रात उन्हें
धीरे-धीरे खोलती है।
तुम्हारी नींद का यह नगर
सुबह होते ही टूटता नहीं
वह अदृश्य हो जाता है।
जैसे कोई मंदिर
जो केवल साधक को दिखता है।
और जब तुम जागती हो,
तो तुम्हारे चेहरे पर
एक नई रेखा जुड़ चुकी होती है,
अनुभव की,
या स्वीकार की।
तुम समझती नहीं,
पर हर रात
तुम्हारी आत्मा
अपने लिए एक नया घर बनाती है।
तुम्हारी नींद का गुप्त स्थापत्य
दरअसल
तुम्हारे भीतर का वह शिल्प है
जो तुम्हें
तुम्हारे ही गहरे स्वरूप से
मिलाता रहता है।
मुकेश्,,,
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