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Saturday, 21 February 2026

किराए के शहर में किराए का सुकून

 किराए के शहर में किराए का सुकून


किराए के शहर में

किराए का सुकून होता है

जितना पैसा दो,

उतनी ही देर ठहरता है।


यहाँ मकान हमारे नहीं होते,

दीवारें भी पहचान नहीं पूछतीं,

और दरवाज़े

हर साल नया ताला सीख लेते हैं।


शहर हमें नाम से नहीं,

पते से जानता है

फ़्लैट नंबर,

लेन,

पोस्टकोड।


हम आते हैं

एक सूटकेस में ज़िंदगी भरकर,

और अलमारी में रखते हैं

कुछ कपड़े,

कुछ आदतें,

और बहुत-सी ख़ामोशियाँ।


यहाँ पड़ोसी

मुस्कान उधार में देते हैं,

हालचाल भी

सीढ़ियों जितना ही होता है

चढ़ते-उतरते।


किराए के शहर में

दोस्ती भी अस्थायी होती है,

जैसे वाई-फ़ाई का पासवर्ड

काम चले,

फिर बदल जाए।


शाम को

बालकनी से दिखता है

किसी और का आसमान,

और रात को

किसी और की छत पर

बारिश की आवाज़ आती है।


हम चाय बनाते हैं

अपने हाथ से,

मगर कप

शहर का होता है।


सुकून भी ऐसा ही है

पूरा नहीं,

बस काम चलाऊ।


वो इतना होता है

कि सुबह उठ सको,

ऑफ़िस पहुँच सको,

और रात को

थोड़ा-सा थक कर

सो सको।


घर की तरह

गले नहीं लगता,

बस कंधे पर

हाथ रख देता है।


कभी-कभी

पुराने शहर की याद

अचानक किराया माँग लेती है

माँ की आवाज़,

गलियों की धूल,

छत पर सूखते कपड़े।


तब समझ आता है

शहर बदले जा सकते हैं,

मगर जड़ें नहीं।


किराए के शहर में

हम खुद भी

थोड़े किराए के हो जाते हैं

कम बोलते हैं,

कम माँगते हैं,

कम उम्मीद रखते हैं।


फिर भी

हर महीने की पहली तारीख़ को

जब किराया देते हैं,

तो दिल चुपचाप कहता है

चलो,

अगला महीना भी

यहीं कट जाएगा।


यही है

किराए के शहर में

किराए का सुकून

न पूरा अपनापन,

न पूरी बेगानगी।


बस

दोनों के बीच की

एक चलती हुई ज़िंदगी।


मुकेश ,,,,,,,,,,

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