फ़ोटो फ़िल्टर के पीछे का चेहरा
फ़ोटो फ़िल्टर के पीछे का चेहरा
कभी आईने में नहीं दिखता।
वो पिक्सल की परतों में लिपटा रहता है,
रौशनी को थोड़ा और उजला,
आँखों को थोड़ा और गहरा,
होठों को थोड़ा और मुस्कुराता हुआ बना देता है।
स्क्रीन पर सब कुछ
मुकम्मल लगता है
जैसे ज़िंदगी ने
किसी एडिट बटन से
अपनी सारी दरारें छुपा ली हों।
मगर सच?
सच उस वक़्त जागता है
जब फ़ोन की बैटरी उतरती है,
और कमरे की ख़ामोशी
चेहरे से सवाल पूछती है।
फ़िल्टर झुर्रियों को मिटा सकता है,
थकान को नहीं।
वो आँखों की नमी को
चमक में बदल सकता है,
मगर उन रातों को नहीं
जो नींद के बिना कटी हों।
हम सब
अपने-अपने फ़िल्टर चुनते हैं
कोई रंगों का,
कोई मुस्कान का,
कोई बेफ़िक्री का।
और धीरे-धीरे
हमें खुद भी याद नहीं रहता
कि असली चेहरा कौन-सा था।
वो जो हँसता है हर तस्वीर में?
या वो जो तस्वीर खिंचने के बाद
चुप हो जाता है?
फ़ोटो में कैद चेहरा
दुनिया को दिखता है,
मगर फ़िल्टर के पीछे
एक और चेहरा होता है
थोड़ा उलझा हुआ,
थोड़ा थका हुआ,
थोड़ा सच्चा।
वही चेहरा
जो आईने के सामने
मुस्कुराने की रिहर्सल नहीं करता।
जो रोता है तो
पलकें भीग जाती हैं,
और हँसता है तो
आवाज़ काँप जाती है।
मुझे डर
फ़िल्टर से नहीं
मुझे डर उस दिन से है
जब हम
अपने ही असली चेहरे से
नज़रें चुराने लगेंगे।
क्योंकि दुनिया को
सुंदर दिखना आसान है,
खुद से सच बोलना मुश्किल।
फ़ोटो फ़िल्टर के पीछे का चेहरा
कोई और नहीं
वही है
जिसे हम सबसे कम दिखाते हैं,
और सबसे ज़्यादा छुपाते हैं।
और शायद
वही चेहरा
सबसे ज़्यादा मोहब्बत के क़ाबिल होता है।
मुकेश ,,,,,,,
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