Pages

Tuesday, 17 February 2026

ख़ामोशी के कंधे पर सिर रखे सपने

ख़ामोशी के कंधे पर

सिर रखे सपने

धीरे-धीरे साँस लेते हैं

जैसे रात की नब्ज़

चाँदनी में धड़क रही हो।


कोई शोर नहीं,

कोई दावा नहीं,

बस पलकों के भीतर

हल्की-सी रौशनी का कंपन।


ये सपने बोलते नहीं,

पर सुनते बहुत हैं—

दिल की दरारों में छुपी

अनकही बातों को,

थके हुए यक़ीन को,

और उम्मीद की अंतिम लौ को।


ख़ामोशी उन्हें सहलाती है,

जैसे माँ

बच्चे के माथे पर हाथ रखे—

बिना प्रश्न,

बिना शर्त।


कभी-कभी

इन सपनों की पलकों से

एक आह टपक जाती है,

और रात उसे

ओस बनाकर

सुबह की घास पर सजा देती है।


ख़ामोशी के कंधे पर

सिर रखे सपने

हकीकत से भागते नहीं,

बस थोड़ा ठहरते हैं

ताकि टूटने से पहले

खुद को समेट सकें।


और जब सुबह आती है,

वे उठते हैं

थोड़े नम,

थोड़े मजबूत,

और थोड़ा-सा यक़ीन लेकर

कि हर शोर के पार

एक ऐसी जगह है

जहाँ उन्हें

आराम मिल सकता है।


मुकेश ,,,,,,,,,

No comments:

Post a Comment