जब तुम नहीं होते,
कमरे में सब कुछ होता है —
दीवारें, रोशनी, हवा…
पर फिर भी
एक अजीब-सा खालीपन
चारों ओर फैल जाता है।
उसी खालीपन में
धीरे-धीरे जन्म लेता है
तुम्हारा नाम।
शून्य की गोद में
तुम्हारी आवाज़
बिना शब्दों के उतरती है,
जैसे बंद आँखों पर
कोई नरम उजाला रख दिया गया हो।
मैं कुछ कहता नहीं,
पर दिल के भीतर
एक महीन-सी तान बजती है —
तुम्हारी।
तुम दूर हो,
पर दूरी यहाँ तक नहीं आती।
वह रास्तों में भटक जाती है,
और तुम्हारा अहसास
सीधे मेरी धड़कनों में घर कर लेता है।
यह प्रेम
मिलन का मोहताज नहीं,
यह तो उस मौन का साथी है
जहाँ हम दोनों
कुछ भी बोले बिना
सब कुछ कह लेते हैं।
जब दुनिया की आवाज़ें
धीमी पड़ जाती हैं,
और रात
अपनी चुप्पी बिछा देती है,
तब शून्य की गोद में
हमारा प्रेम
सबसे साफ़ सुनाई देता है।
कोई वादा नहीं,
कोई शर्त नहीं —
बस एक कोमल-सा विश्वास,
कि जहाँ कुछ भी नहीं दिखता,
वहीं तुम सबसे अधिक उपस्थित हो।
शून्य की गोद में स्वर
दरअसल
हमारी मोहब्बत है —
जो शब्दों से परे,
पर हर साँस में शामिल है।
मुकेश्,,
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