शब्दों की चिंगारियाँ
1. प्रारम्भ : आग से पहले का मौन
शुरू में
कोई शब्द नहीं था,
सिर्फ़ एक कंपन था—
जैसे ब्रह्मांड कुछ कहने से पहले
गला साफ़ कर रहा हो।
उस मौन में
पहली चिंगारी गिरी,
न आग बनी,
न रोशनी
सिर्फ़ एहसास।
मैं समझ गया,
शब्द पैदा नहीं होते,
वे गिरते हैं
कहीं बहुत ऊपर से।
2. चिंगारियाँ और देह
शब्दों की चिंगारियाँ
जब देह पर गिरती हैं
तो जलन नहीं होती,
स्मृति जागती है।
एक शब्द
कंधे पर गिरता है—
और अचानक
किसी पुराने जन्म का बोझ
महसूस होने लगता है।
दूसरा शब्द
होंठों को छूता है—
और चुप्पी बोलने लगती है।
तीसरा शब्द
दिल पर गिरता है—
और दिल
अपनी भाषा भूल जाता है।
3. प्रेम : आग का सबसे नाज़ुक रूप
प्रेम
सबसे ख़तरनाक चिंगारी है,
क्योंकि वह
जलाकर भी ठंडा रखती है।
तुमने जब कहा—
कुछ नहीं,
तो उस कुछ नहीं में
हज़ार शब्द जल उठे।
मैंने जवाब नहीं दिया,
क्योंकि जवाब देना
आग को नाम देना होता है।
मैंने प्रेम को
क्रिया नहीं रहने दिया,
उसे
चिंगारी की तरह
अनिश्चित छोड़ दिया।
4. भाषा का विघटन
शब्द धीरे-धीरे
अपनी शक्ल खोने लगे।
व्याकरण पिघल गया,
अर्थ टपकने लगे,
और वाक्य
अपनी रीढ़ खो बैठे।
अब
“मैं” और “तुम”
अलग-अलग नहीं थे—
वे बस
अलग-अलग तापमान थे
एक ही आग के।
5. राजनीति, इतिहास और राख
कुछ शब्द
इतिहास से आए थे—
उनमें बारूद मिला था।
कुछ शब्द
धर्म से आए—
उनमें डर था।
कुछ शब्द
राजनीति से आए—
वे पहले ही जले हुए थे।
मैंने उन्हें
अपनी नज़्म में आने दिया,
लेकिन उन्हें
राज नहीं करने दिया।
क्योंकि
कविता में
राख भी
समान अधिकार रखती है।
6. मौन : आग के बाद
जब सब कुछ जल गया,
तो मौन बचा।
मौन कोई खाली जगह नहीं,
वह सबसे गहरी आवाज़ है।
वहाँ
शब्द नहीं होते,
लेकिन
शब्दों की स्मृति
जिंदा रहती है।
यह वही जगह है
जहाँ सूफ़ी
ख़ुदा से नहीं,
अपने आप से मिलते हैं।
7. पुनर्जन्म : नई चिंगारी
राख ठंडी हुई,
और अचानक
एक नई चिंगारी।
पहले से धीमी,
पहले से सजग।
अब शब्द
चिल्लाते नहीं,
फुसफुसाते हैं।
अब कविता
कुछ साबित नहीं करती,
सिर्फ़
साथ चलती है।
8. समापन : कविता का स्वीकार
शब्दों की चिंगारियाँ
अब मुझे नहीं जलातीं,
वे मुझे
जगाती हैं।
मैं जान गया हूँ
हर शब्द को
आग नहीं बनना चाहिए,
कुछ को
चिंगारी ही रहना चाहिए।
क्योंकि
पूरी दुनिया जलाने से
कोई सूफ़ी पैदा नहीं होता,
लेकिन
एक चिंगारी
पूरा ब्रह्मांड
महसूस करा सकती है।
मुकेश्,,,
No comments:
Post a Comment