संगम के पार तुम्हारा चेहरा
संगम के पार
तुम्हारा चेहरा
पानी में नहीं,
दूरी में बनता है।
गंगा कुछ कहती है,
यमुना चुप रहती है
और उनके बीच
तुम्हारी आँखों का रंग
ठहर जाता है।
मैं यहाँ खड़ा हूँ,
हाथ खाली,
नज़र भरी हुई—
जैसे प्रार्थना
बिना शब्दों के।
न नाव बुलाती है,
न किनारा
बस
एक चेहरा है
जो पास नहीं आता,
पर
डूबने भी नहीं देता।
संगम के पार
तुम्हारा चेहरा
मेरे भीतर
दो नदियों की तरह
बहता रहता है।
मुकेश्,,,
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