धुंध के शहर में अकेला मुसाफ़िर
धुंध के शहर में
रास्ते सीधे नहीं होते,
वे मुड़ते हैं,
घुलते हैं,
और फिर अचानक
ग़ायब हो जाते हैं।
वहीं कहीं
एक अकेला मुसाफ़िर चलता है,
कंधों पर सवालों की गठरी,
आँखों में अधूरी दिशाएँ,
और दिल में
एक धीमा-सा यक़ीन।
उसे मंज़िल का नाम नहीं मालूम,
बस इतना जानता है
कि ठहर जाना
उसके हिस्से में नहीं लिखा।
धुंध
उसकी आँखों को नहीं,
उसके भीतर को परखती है।
हर क़दम पर
वो अपने ही भय से मिलता है,
और हर मोड़ पर
अपनी ही परछाईं से।
कभी उसे लगता है
कोई साथ चल रहा है,
कोई अनदेखा हाथ
उसकी पीठ पर रख
हौले से कहता है,
“चलते रहो।”
रात जब घनी हो जाती है,
वो अपने भीतर
एक छोटा-सा चिराग़ जलाता है।
उसकी लौ
धुंध को चीरती नहीं,
बस उसे सहना सिखाती है।
लोगों की भीड़
कभी पास से गुज़रती है,
पर हर चेहरा
धुंध में घुला हुआ,
जैसे पहचान
सिर्फ़ एक भ्रम हो।
और तब
वो समझता है,
शहर बाहर नहीं,
भीतर धुंधला है।
जब मन साफ़ होगा,
रास्ते खुद-ब-खुद उभर आएँगे।
धुंध के शहर में
अकेला मुसाफ़िर
दरअसल अकेला नहीं
उसके साथ
उसकी जागरूकता है,
उसकी धड़कनों की तिलावत है,
और एक मौन आकाश
जो हर क़दम पर
उसे थामे रहता है।
वो चलता रहता है,
क्योंकि उसे पता है,
धुंध स्थायी नहीं होती,
पर चलना
उसकी साधना है।
No comments:
Post a Comment