ख़्वाबों की अदालत में बेआवाज़ फ़रियाद
ख़्वाबों की अदालत में
आज फिर पेशी थी,
ना कोई जज दिखाई दिया,
ना कोई गवाह,
बस दीवारों पर टंगे
अधूरे चेहरों के साए।
मैंने होंठ खोले,
पर आवाज़
गले में ही धुंध बनकर बैठ गई।
फ़रियाद लिखी थी
आँखों की नमी में,
स्याही बनी थी
रात की तन्हाई।
इल्ज़ाम था,
कि मैंने उम्मीदों को
हद से ज़्यादा सच मान लिया,
और दिल को
दलीलों से ऊपर रख दिया।
ख़्वाबों की अदालत में
कानून अलग होते हैं,
यहाँ सबूत नहीं,
एहसास तौले जाते हैं;
यहाँ गवाही नहीं,
धड़कनों की रफ़्तार दर्ज होती है।
मैंने चुप रहकर
अपनी सफ़ाई दी,
क्योंकि कुछ सच
बोले जाएँ तो टूट जाते हैं,
और कुछ दर्द
कहे जाएँ तो हल्के नहीं होते।
फैसला आया,
ना बरी,
ना मुजरिम।
बस एक आदेश,
“ख़ुद को माफ़ करो।”
तब समझ आया—
यह अदालत बाहर नहीं,
भीतर लगती है।
और हर बेआवाज़ फ़रियाद
आख़िरकार
अपने ही दिल के सामने
सुनी जाती है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,
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