बिखरे हुए ख़्वाबों का दरवेश
वो कोई फ़क़ीर नहीं था
जिसकी झोली में सिक्कों की खनक हो
उसकी झोली में थे
टूटे हुए ख़्वाबों के काँच,
और हर काँच में
एक अधूरी दुआ की चमक।
वो शहर-ए-नींद की गलियों में
नंगे पाँव चलता था,
जहाँ लोग सपनों को
तकियों के नीचे छुपाकर सो जाते हैं,
और सुबह होते ही
उन्हें झूठ की धूप में सुखा देते हैं।
मगर वह,
वो तो दरवेश था,
बिखरे हुए ख़्वाबों का दरवेश।
जो हर टूटन को
इबादत की तरह समेटता,
हर आह को
अज़ान की तरह सुनता था।
उसकी आँखों में
रात का समंदर था,
जिसमें डूबकर
चाँद भी अपने दाग भूल जाता।
वो कहता—
“जो सपना टूटा है,
वो दरअसल परदा था;
हक़ीक़त तो उसके पीछे खड़ी है।”
लोग उसे पागल समझते रहे,
वो उन्हें सोया हुआ।
वो मुस्कुराता रहा
जैसे दर्द उसकी रूह का
पुराना हमसफ़र हो।
एक दिन
उसने सारे बिखरे ख़्वाब
हवा के हवाले कर दिए,
और ख़ुद
ख़ामोशी की चादर ओढ़
अंदर की मस्जिद में बैठ गया।
अब जब भी
किसी का सपना टूटता है,
कहीं न कहीं
वो दरवेश
अपनी हथेली फैला देता है
टूटन को थामने के लिए,
और उसे दुआ में बदलने के लिए।
कहते हैं,
जिसे अपने बिखरे ख़्वाबों में
रौशनी दिख जाए
वही असली दरवेश है,
वही रूह का सच्चा मुसाफ़िर।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,
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