ख़ामोशी का ख़ानक़ाह
शहर के शोर से दूर
एक ऐसा मुक़ाम भी है
जहाँ आवाज़ें
दहलीज़ पर उतरकर
अपने जूते उतार देती हैं।
वहीं है—
ख़ामोशी का ख़ानक़ाह।
न कोई मीनार,
न कोई चिराग़ों की कतार,
बस भीतर उतरती हुई
एक धीमी-सी रोशनी,
जो दिल की दीवारों पर
नाम-ए-हक़ लिखती जाती है।
यहाँ शब्द नहीं बोलते,
साँसें तस्बीह बन जाती हैं।
हर धड़कन
सजदे में झुकी हुई लगती है,
और आँखें
बिना आँसू के भी भीग जाती हैं।
जो यहाँ आता है,
अपना बोझ
दरवाज़े पर ही छोड़ देता है।
अहम् की चादर
खुद-ब-खुद उतर जाती है,
और रूह
नंगे पाँव चलने लगती है
अपने ही भीतर।
दीवारों पर
कोई आयत लिखी नहीं,
मगर हर ईंट
एक अनुभव है—
किसी टूटी दुआ का,
किसी बिखरी मोहब्बत का,
किसी अधूरे मिलन का।
यहाँ दरवेश
बिना चोग़े के मिलते हैं,
फ़क़ीर
बिना कटोरे के।
सबके हाथ खाली—
मगर भीतर
असीम आकाश भरा हुआ।
ख़ामोशी का ख़ानक़ाह
किसी शहर में नहीं,
किसी नक़्शे पर नहीं—
वह तो बस
उस क्षण में खुलता है
जब तुम
अपने ही शोर से थककर
आँखें बंद करते हो।
और तब
अंदर से एक धीमी-सी आवाज़ आती है—
जो आवाज़ नहीं होती,
बस एक पहचान होती है।
वहीं से शुरू होती है
इबादत।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
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