Pages

Tuesday, 17 February 2026

दर्द की दवात

 दर्द की दवात


मेरी मेज़ पर

एक दवात रखी है,

स्याही की नहीं,

दर्द की।


उसमें डुबोकर जब भी

क़लम उठाता हूँ,

हर हरफ़

थोड़ा-सा काँपता है,

जैसे किसी पुराने ज़ख़्म की

नब्ज़ छू ली हो।


ये दवात

किसी बाज़ार से नहीं आई;

वक़्त ने इसे

आँसुओं से गढ़ा है,

और यादों ने

धीरे-धीरे भर दिया है।


जब भी

कोई रिश्ता टूटता है,

उसकी किरचें

आकर इसमें गिर जाती हैं।

जब कोई सपना बिखरता है,

उसकी धूल

इसकी तह में बैठ जाती है।


फिर एक दिन

उसी धूल से

एक आयत बनती है,

उसी किरच से

एक रोशनी झरती है।


दर्द की दवात

सज़ा नहीं देती

वो शब्दों को

पाक करती है।

जो कुछ भीतर सड़ रहा हो,

उसे बहा देती है

स्याही बनकर।


कभी-कभी

मैं सोचता हूँ

काश ये दवात खाली हो जाए,

मगर तब

क़लम भी सूख जाएगी।


शायद इसलिए

रूह अपने ज़ख़्मों को

पूरी तरह भरने नहीं देती;

थोड़ा-सा दर्द बचा रहता है,

लिखने के लिए,

जीने के लिए,

और यह जानने के लिए

कि हर आँसू

आख़िरकार

एक पवित्र शब्द बन सकता है।


मुकेश ,,,,,,,,,

No comments:

Post a Comment