अधूरी पंक्तियों का सूफ़ी
वो मुकम्मल किताबों का आदमी नहीं था,
उसे पूरी कहानी से ज़्यादा
रुक जाना पसंद था
ठीक वहीं,
जहाँ सांस और शब्द
एक-दूसरे को टटोलते हैं।
वो अधूरी पंक्तियों का सूफ़ी था।
उसकी दरी पर
फैली रहती थीं आधी लिखी कविताएँ,
जिनके आख़िरी शब्द
जानबूझकर छोड़ दिए गए थे
ताकि पाठक
अपनी रूह से उन्हें पूरा करे।
वो कहता
“जो पूरा है,
वो बंद है।
जो अधूरा है,
वही दरवाज़ा है।”
उसके लफ़्ज़
अक्सर तीन बिंदुओं पर ठहर जाते,
और वहीं से शुरू होती थी
सबसे गहरी इबादत।
क्योंकि खामोशी
उसी जगह जन्म लेती है
जहाँ वाक्य थककर बैठ जाता है।
लोग उससे
अंतिम निष्कर्ष पूछते रहे,
वो मुस्कुराकर
आकाश की ओर देखता
जैसे कहना चाहता हो,
कि नतीजे तो अहंकार को चाहिए,
रूह को तो सफ़र।
उसकी आधी लिखी दुआएँ
हवा में तैरती रहतीं,
और जो भी उन्हें छू लेता,
अपने भीतर
एक खाली जगह महसूस करता
जिसे भरने की जल्दी नहीं होती।
अधूरी पंक्तियों का सूफ़ी
जानता था,
कि परम सत्य
पूर्ण विराम में नहीं,
अल्पविराम में छिपा है।
इसलिए उसने
हर कविता को
थोड़ा-सा अधूरा छोड़ा
ताकि ईश्वर
उसमें अपनी लिखावट जोड़ सके।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
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