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Friday, 20 February 2026

खिड़कियाँ — जहाँ हर मौसम के साथ कोई चला जाता है

 खिड़कियाँ — जहाँ हर मौसम के साथ कोई चला जाता है

(और कभी-कभी कोई लौट आता है हवा के झोंके में)


खिड़कियाँ —

जिन्हें हम अक्सर केवल रोशनी और हवा के रास्ते मानते हैं,

वो दरअसल हमारे भीतर झाँकने की सबसे पारदर्शी जगहें होती हैं।

हर खिड़की किसी मौसम की याद लेकर आती है,

और किसी को विदा कर चुकी होती है।


खिड़की से बाहर देखना

सिर्फ़ बाहर देखना नहीं होता।

कभी यह अंदर की तरफ़ सबसे गहरा झाँकना होता है।

खासकर उन दोपहरों में

जब सूरज दहलीज़ तक तो आता है,

पर भीतर नहीं घुसता।


बचपन की खिड़की

जिससे आसमान में उड़ते पतंगों को देखा था,

बिल्ली के बच्चे को आँगन में खेलते पाया था,

जहाँ से पहली बार बारिश को गिरते देखा था

और समझा था —

कि हर बूँद में एक कहानी होती है।


वही खिड़की बड़ी होकर

एक अधूरी चिट्ठी की तरह लगती है,

जिसे कोई कभी भेज नहीं पाया।


माँ की खिड़की

जहाँ से वो हर शाम

सड़क की ओर देखती थी,

“अभी नहीं आया? इतनी देर हो गई!”

और फिर हल्के-से परदे सरका देती थी

कि कोई देख न ले उसकी बेसब्री।


उस खिड़की की चौखट पर

एक अदृश्य इन्तज़ार बैठा होता था,

जो दिन के उजाले में नहीं,

रात के अँधेरों में पनपता था।


पिता की खिड़की

कम खुलती थी।

शायद आदत नहीं थी बाहरी रौशनी की,

या अंदर की दीवारें ज़्यादा क़रीब लगती थीं।


पर जब कभी अकेले बैठे सिगरेट पीते हुए

वो खिड़की खोली जाती थी,

तो धुएँ के साथ कुछ पुराने सपने भी बाहर झाँकने लगते थे।


जवान बेटे की खिड़की

वो अक्सर बंद रखता है।

कमरे में अँधेरा और स्क्रीन की रौशनी —

उसकी खिड़की अब डिजिटल हो गई है।

पर जब वो एक बार पर्दा हटाता है,

तो सूरज पूछता है —

"कहाँ थे इतने दिन?"


बिटिया की खिड़की

उसे ज़्यादा देर खोलने की इजाज़त नहीं होती।

मौसम बदलते हैं,

पर खिड़की पर लगे पर्दे नहीं।

वो अपने सपनों को

उस खिड़की के शीशे पर उँगलियों से लिखती है,

और फिर आहिस्ता से पोंछ देती है

कि कोई पढ़ न ले।


कुछ खिड़कियाँ बंद पड़ी हैं

पुराने कमरों की दीवारों में,

जिन्हें अब कोई नहीं खोलता।

उनमें मकड़जाल हैं, धूल की परतें हैं,

और कुछ रौशनी के बासी टुकड़े।


पर जब कभी हवा का एक तेज़ झोंका आता है,

तो उनमें से भी कोई पुरानी हँसी निकल आती है —

जो पहले कभी उस कमरे में गूँजी थी।


खिड़कियाँ, दरअसल...

सिर्फ़ रास्ते नहीं होतीं

बल्कि उन लम्हों की दीवार होती हैं

जिन्हें हम अपने अंदर बंद नहीं कर सकते।


वे मौसमों की तरह आती हैं,

कभी सर्द हवा बनकर

तो कभी तपते उजाले की तरह

और कभी-कभी

बस एक साँस की तरह 

जो रुकती नहीं, पर छू जाती है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,

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