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Friday, 20 February 2026

उस चौराहे पर कोई खड़ा नहीं था

 उस चौराहे पर कोई खड़ा नहीं था

(जहाँ कभी दुनिया रुक कर देखती थी)


शहर चुप था — जैसे किसी ने उसकी ज़ुबान चुरा ली हो।

सड़कें अपनी ही दरारों में घुटती हुई साँसें छुपा रही थीं।

पेड़ों की शाख़ें झूल नहीं रही थीं — वो लटक रही थीं —

किसी सूखे विश्वास की तरह जो अब सिर्फ़ वक़्त की गर्द में दफ़न था।


खिड़कियाँ थीं — मगर उनमें कोई चेहरा नहीं।

बालकनियाँ थीं — पर हँसी का कोई क़तरा नहीं टपका आज।

दरवाज़े अपने आप में सिमटे हुए,

जैसे डरते हों कि अगर खोल दिए गए

तो उनकी लकड़ियों से बिसरी हुई चीखें निकल आएँगी।


जो मंदिर कल तक भरे रहते थे घंटियों की गूँज से,

आज वहाँ देवता भी संकोच में हैं —

प्रार्थनाएँ आई नहींं, और दीये बिना बात जलाए जा रहे हैं।


चौराहे जहाँ कभी जनसभा होती थी —

अब वहाँ एक कुर्सी उलटी पड़ी है,

और धूल ने वहाँ तख़्त का रूप ले लिया है।


सिग्नल की लाल बत्ती जल रही है,

मगर कोई गाड़ी नहीं।

कोई क़दम नहीं।

कोई मंज़िल नहीं।


कभी लग रहा था ये शहर हमारा है,

आज लग रहा है, हम किसी और के हो गए हैं।


मैं पुकार रहा हूँ —

सिर्फ़ यह जानने के लिए कि क्या कोई है वहाँ…

पर हर आवाज़ लौट कर मुझसे ही टकरा जाती है।

सन्नाटा अब केवल ख़ामोशी नहीं है,

वह अब एक जीवित, साँस लेती सत्ता है

जो कहती है —

"तुम आए बहुत देर से — अब कोई उत्तर नहीं बचा।"


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,

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