उजड़े हुए एहसास का नक़्शा
उजड़े हुए एहसास का नक़्शा
मैंने आज फिर खोला—
उसमें कोई शहर नहीं था,
बस कुछ ख़ामोश सरहदें थीं
जो आँसुओं की स्याही से खींची गई थीं।
वहाँ एक वीरान चौक था
जहाँ कभी तुम्हारी हँसी
अज़ान की तरह गूंजती थी,
और दिल के मकानों में
चराग़-ए-उम्मीद जलते थे।
अब वही चौक
रेत से ढका है—
जैसे वक़्त ने अपनी उँगलियों से
हर पदचिन्ह मिटा दिया हो।
मैं उस नक़्शे में
एक टूटी हुई मस्जिद भी देखता हूँ,
जिसकी मेहराबों पर
दुआओं की परतें जमी हैं,
और सज्दों की मिट्टी
अब भी नम है।
किसी सूफ़ी की तरह
मैंने उस उजाड़ को चूमा
कि शायद इश्क़ की राख में
कोई चिनगारी बची हो।
तन्हाई की हवाएँ
जब इस नक़्शे पर बहती हैं,
तो बीते लम्हों की धूल
फिर से उड़ने लगती है,
और एक ख़ुशबू-सी
दिल की गहराइयों में उतरती है—
जैसे रूह को उसका भूला हुआ वतन याद आ गया हो।
उजड़े हुए एहसास का यह नक़्शा
दरअसल बर्बादी का बयान नहीं,
बल्कि उस रास्ते की निशानी है
जहाँ मोहब्बत ने
अपना आख़िरी क़दम रखा था।
मैंने सीखा
कि उजड़ना भी एक इबादत है,
अगर उसमें ख़ुदा की तलाश हो।
और तब से
मैं अपने ही दिल के मलबे में
एक रौशन दरवाज़ा ढूँढता हूँ—
जहाँ से फ़ना की राह निकलती हो
और बक़ा की सुबह उगती हो।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,
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