राख में दबे ख़्वाबों की तहकीक़ात
मैंने एक रात तन्हाई की अदालत में की
जहाँ चाँद गवाह था
और सितारे,
बस ख़ामोश मुंसिफ़।
मेरे सामने
कुछ अधजले मौसम रखे थे,
उनकी ख़ुशबू में
माज़ी की सर्द आहें थीं।
मैंने उँगलियों से कुरेदा
वो राख
कि शायद कोई रंग बचा हो,
कोई अधूरी धड़कन
जो अब भी ज़िंदा हो।
हर ख़्वाब का चेहरा
धुएँ में लिपटा था,
जैसे किसी ने इश्क़ की किताब
आग के हवाले कर दी हो।
लफ़्ज़ जल गए थे,
मगर मानी
अब भी अंगारों की तरह
चमक रहे थे।
मैंने देखा
कुछ ख़्वाब ख़ुदा की तलाश में थे,
कुछ इंसान की मोहब्बत में,
और कुछ बस
अपनी ही परछाई से भागते रहे।
राख की तह में
एक नन्ही-सी चिनगारी मिली
वो किसी वादा-ए-विसाल की नहीं,
बल्कि फ़ना की समझ की थी।
जैसे कोई सूफ़ी
अपनी ही हार में
फ़तह का सराग़ पा ले।
तहकीक़ात के बाद
मैंने फ़ैसला नहीं सुनाया
बस उस राख को
अपने सीने पर मल लिया,
कि शायद यही धूल
मेरे तक़द्दुस का सबब बन जाए।
अब जब भी
कोई नया ख़्वाब आँखों में उतरता है,
मैं उसे पहले
राख की उस ज़मीन पर रखता हूँ
जहाँ जलकर भी
रोशनी मरती नहीं।
राख में दबे ख़्वाबों की तहकीक़ात
दरअसल यह बताती है
कि जो कुछ जला है
वो मिटा नहीं,
वो बस रूप बदल कर
रूह की स्याही में उतर गया है।
मुकेश इलाहाबादी ,,,,,,,
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