नक्शों के बाहर का भूगोल
नक्शों में सब कुछ सटीक होता है
रेखाएँ सीधी,
सीमाएँ स्पष्ट,
रंग अलग-अलग।
पर जो सचमुच जीया जाता है,
वह अक्सर
नक्शों के बाहर होता है।
वहाँ न कोई देश मोटे अक्षरों में लिखा होता है,
न समुद्र पर नीली स्थिरता;
वहाँ पसीने की गंध है,
रोटी की भाप है,
मातृभाषा की काँपती हुई लय है।
नक्शे कहते हैं
“यहाँ से यहाँ तक।”
पर रिश्ते
सीमाएँ नहीं मानते।
एक नदी
दो देशों से होकर गुजरती है,
पर उसका जल
किसी एक झंडे का नहीं होता।
नक्शों के बाहर का भूगोल
यादों में बसता है
जहाँ बचपन की गली
किसी राजधानी से बड़ी होती है,
और माँ की रसोई
किसी साम्राज्य से अधिक गर्म।
वहाँ दिशाएँ
कम्पास से नहीं,
धड़कनों से तय होती हैं।
प्रवासी के लिए
घर एक बिंदु नहीं,
एक फैलती हुई वृत्त-रेखा है
जहाँ भी उसकी भाषा उसे पहचान ले,
वहीं उसका देश है।
नक्शे युद्धों के बाद बदलते हैं,
पर लोकगीत नहीं बदलते।
सीमाएँ खिंचती और मिटती रहती हैं,
पर स्मृतियों का भूगोल
अटल रहता है।
नक्शों के बाहर
एक और संसार है
जहाँ मनुष्य
पहले मनुष्य है,
फिर नागरिक।
जहाँ रास्ते
काग़ज़ पर नहीं,
पाँवों की धूल में बनते हैं।
और शायद
सबसे सच्चा भूगोल वही है
जो किसी एटलस में दर्ज नहीं,
पर हर हृदय में
अपनी आकृति लिए
धड़कता रहता है।
मुकेश ,,,,,,,,
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