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Friday, 20 February 2026

दरवाज़े पर पड़ोसन से बतियाते हुए

 शाम की धूप

सीढ़ियों पर तिरछी उतर रही है,

और दरवाज़ा आधा खुला है

जैसे घर ने अपने होंठों पर

एक मुस्कुराहट रख छोड़ी हो।


तुम चौखट पर ठहरी हो,

एक हाथ दरवाज़े की कुंडी पर,

दूसरा आँचल सँभाले

सामने पड़ोसन खड़ी है,

आँखों में रोज़मर्रा की हल्की-सी चमक लिए।


बातें कोई ख़ास नहीं

नमक ख़त्म हो गया था,

कल रात बिजली कुछ देर गई थी,

गली के मोड़ पर नई दुकान खुली है—

मगर इन मामूली बातों के बीच

हँसी का जो रेशमी धागा बुनता है,

वही असल रिश्ता है।


तुम्हारी हँसी

दीवारों से टकराकर

आँगन में उतरती है,

जैसे कबूतरों की हल्की फड़फड़ाहट।

पड़ोसन की आवाज़ में

थोड़ी शिकायत, थोड़ी शरारत

और तुम “अच्छा!” कहते हुए

भौंहों को ज़रा-सा उठाती हो।


दरवाज़े की चौखट

दो घरों के बीच की सरहद है,

मगर इस वक़्त

वो सरहद नहीं, सेतु लगती है।

हवा में चायपत्ती और साबुन की मिली-जुली ख़ुशबू है,

और शब्द

बिना सजावट के,

बिना तकल्लुफ़ के

सीधे दिल से निकलते हैं।


तुम कभी हल्का-सा झुककर

कुछ राज़-सा कहती हो,

वो हथेली से मुँह ढँककर हँस पड़ती है

जैसे दोपहर की थकान

अचानक शाम की राहत बन गई हो।


मैं दूर से देखता हूँ

ये कोई बड़ी घटना नहीं,

न कोई नाटकीय दृश्य

बस ज़िंदगी का एक सादा लम्हा,

जो अपनी मासूमियत में

बेहद ख़ूबसूरत है।


दरवाज़ा अभी भी आधा खुला है

और लगता है

दो घरों के बीच

रिश्ते की एक हल्की-सी रौशनी

चुपचाप जल रही है।


मुकेश ,,,,,,,

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