दोपहर की धूप
गली के मोड़ पर ठहरी हुई है,
और तुम
हल्की-सी चुन्नी सँभाले
सब्ज़ीवाले के ठेले के सामने खड़ी हो
जैसे रंगों की एक तहज़ीबी महफ़िल में
सबसे नर्म लहजा उतर आया हो।
ठेले पर सजी भिंडी
हरी चूड़ियों-सी खनकती है,
टमाटर सुर्ख़ गालों-से दमकते हैं,
धनिए की पत्तियों से
ताज़गी की खुशबू उठती है
और तुम उँगलियों से
एक-एक सब्ज़ी को यूँ परखती हो
मानो लफ़्ज़ चुन रही हो किसी ग़ज़ल के लिए।
“कुछ कम कर दो भैया…”
तुम्हारी आवाज़ में
न शिकवा, न हुक्म—
बस एक नर्म-सी दरख़्वास्त,
जिसमें मुस्कुराहट की हल्की शरारत घुली है।
सब्ज़ीवाला पहले इंकार करता है,
फिर तुम्हारी आँखों की चमक से हार जाता है।
ये मोलभाव भी क्या अजीब फ़न है—
जहाँ दाम से ज़्यादा
अंदाज़ काम आता है।
तुम सिक्के गिनती हो
हथेली पर धूप का एक टुकड़ा ठहर जाता है।
झोले में गिरती सब्ज़ियाँ
ऐसा लगता है
जैसे मौसम अपने रंग
तुम्हारे साथ घर भेज रहा हो।
हल्की-सी पसीने की बूँद
कनपटियों पर चमकती है,
पर तुममें कोई हड़बड़ी नहीं
सादगी का एक वक़ार है,
घरेलू ज़िम्मेदारियों की एक नफ़ासत।
गली से गुज़रती हवा
तुम्हारी चुन्नी से खेलती है,
और मैं दूर खड़ा
इस मामूली-से मंज़र में
ज़िंदगी का पूरा फ़लसफ़ा पढ़ लेता हूँ।
कितना अजीब है
रोज़मर्रा की इस छोटी-सी रस्म में
तुम्हारी शख़्सियत का उजाला झलकता है।
न कोई बनावट,
न कोई तामझाम
बस तुम,
ठेले पर सजी सब्ज़ियाँ,
और लम्हों की वह ख़ूबसूरत सादगी
जो हर शोर से ज़्यादा दिलनशीं है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,
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