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Friday, 20 February 2026

तुम नहा के अभी - अभी निकली हो - एक शब्द चित्र -

तुम अभी-अभी नहाकर निकली हो

जैसे सुबह किसी आबशार से धुलकर

सफ़ेद दुपट्टा ओढ़े आँगन में उतरती है।


गीले गेसू तौलिये में यूँ लिपटे हैं

मानो बादल ने अपनी बारिश

अभी-अभी समेट कर बाँध ली हो।

उनकी भीनी-सी ख़ुशबू

हवा में धीमे-धीमे घुल रही है

जैसे इत्र की नहीं,

किसी मासूम दुआ की महक हो।


काँधे पर टपकती बूँदें

मोती-सी चमकती हैं,

हर क़तरा जैसे

रौशनी से लिखी हुई एक नर्म आयत।

तुम्हारी त्वचा पर फिसलती धूप

ऐसा लगता है

जैसे सुबह ने तुम्हें अपने हाथों से तराशा हो।


दाहिने हाथ में

धुले कपड़ों की बाल्टी

उसका वज़्न तुम्हें ज़रा-सा झुका देता है।

वो हल्की-सी झुकी गर्दन

कोई थकान नहीं,

बल्कि हया की नर्म तस्वीर लगती है।


तुम छत पर पहुँचती हो

डोर पर एक-एक कपड़ा फैलाती हुई,

जैसे रंगीन ख़्वाब

आसमाँ की लकीरों पर टाँक रही हो।

सफ़ेद चादर हवा में लहराती है,

और मुझे यूँ लगता है

जैसे बादल ने तुम्हारा आँचल उधार लिया हो।


हवा तुम्हारे गेसुओं से उलझती है,

धूप तुम्हारे क़दमों में बिछ जाती है,

और पूरा आकाश

तुम्हारी सादगी का तमाशबीन बन जाता है।


मैं अपनी खिड़की से

चुपचाप ये मंजर देखता हूँ

बिना आवाज़, बिना दस्तक।

तुम्हारी हर हरकत

एक नज़्म बनती जाती है,

और मैं

उस नज़्म का ख़ामोश क़ारी।


तुम्हें क्या मालूम

इस मामूली-से लम्हे में

ज़िंदगी कितनी ख़ूबसूरत हो जाती है।

न कोई शोर, न कोई दावा—

बस धुली हुई धूप,

हवा में लहराते कपड़े,

और तुम

जैसे रूह की किसी पवित्र तस्वीर का उजला हिस्सा।


मुकेश ,,,,,,,,, 

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