दिल की वीरानी भी अजब शय है
पहले तो वह शहर-ए-आरज़ू को उजाड़ती है,
फिर उसी उजाड़ में कोई धुंधली-सी रौशनी टांक देती है।
जैसे शाम ढले का आकाश,
जिसमें डूबते सूरज की लाली
किसी ग़मगीन मुस्कान की तरह ठहरी रहती है।
मैंने जब अपने दिल की वीरानी को गौर से देखा,
तो मालूम हुआ
यह सिर्फ़ बिछड़न का मलबा नहीं,
यह उन ख़्वाबों की ख़ामोश कब्रगाह है
जो कभी बहुत शिद्दत से जिए गए थे।
यहाँ हर टूटे हुए ख़्वाब के नीचे
एक धड़कन दबी हुई है।
हर बुझी हुई आरज़ू के पीछे
एक ऐसी लौ छुपी है
जो जलते-जलते भी रौशनी का हक़ अदा कर गई।
आख़िरी सज्दा
वह कोई इबादती रस्म नहीं,
वह तो दिल का अपनी ही ख़ाक पर झुक जाना है।
यह वह लम्हा है
जब इंसान अपने अहसासात की राख को
हथेलियों में लेकर
कहता है
“मैंने चाहा था…
और चाहने में कोई ख़ता न थी।”
वीरानी में सज्दा करना
दरअसल उस मोहब्बत को सलाम करना है
जो मुकम्मल न हो सकी,
पर अधूरी रहकर भी मुक़द्दस हो गई।
जब माथा ज़मीन से लगता है,
तो एक अजीब-सी थरथराहट उठती है रगों में
जैसे कोई पुराना नग़्मा
फिर से याद आ गया हो।
उस नग़्मे में शिकवा भी है,
शुक्र भी,
और एक हल्की-सी मुस्कराहट भी
कि जो कुछ मिला,
वह कम न था।
दिल की वीरानी का आख़िरी सज्दा
दरअसल हार का इज़हार नहीं,
बल्कि एहसास की तअज़ीम है।
यह वह क्षण है
जब आदमी अपनी तन्हाई को गले लगाकर
उसे इल्ज़ाम नहीं देता,
बल्कि उसका शुक्र अदा करता है
कि उसी ने उसे उसकी गहराई से मिलाया।
और तब मालूम होता है
वीरानी कोई ख़ालीपन नहीं,
वह एक ऐसा मैदान है
जहाँ यादें ओस की तरह गिरती हैं,
और हर बूंद में
एक पूरी दास्तान चमकती है।
आख़िरी सज्दा करके उठो तो
दिल उतना सूना नहीं रहता।
उसमें एक तहज़ीब बस जाती है
दर्द की तहज़ीब,
चाहत की शालीनता,
और उस ख़ामोश नग़्मे की परछाई
जो कभी पूरी तरह ख़ामोश नहीं होता।
शायद यही सज्दा
वीरानी को इबादत बना देता है
और उजड़े हुए दिल को
एक नये मौसम की आहट।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
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